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सख्त सजा से संदेश

Wed, 30 Sep 2015 08:27 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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मुंबई की जीवन रेखा समझी जाने वाली लोकल ट्रेनों को एक के बाद एक निशाना बनाकर व्यापक खून-खराबे को अंजाम देने वाले आरोपियों में से पांच को फांसी और सात को उम्रकैद की सजा सुनाकर विशेष अदालत ने सख्त संदेश दिया है। 11 जुलाई, 2006 की शाम को पांच मिनट के अंदर सात बम विस्फोटों से मुंबई जैसे दहल गई थी। सिर्फ यही नहीं कि आतंकवादियों ने लोकल ट्रेनों के सबसे व्यस्त समय को खूनी हमले के लिए चुना, बल्कि उनके निशाने पर ज्यादातर फर्स्ट क्लास के कोच थे।
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जिस हमले में दो सौ के करीब लोग मारे गए हों, घायलों की संख्या नौ सौ के लगभग हो, हजारों परिवार प्रभावित हुए हों और रेलवे की संपत्ति को भारी नुकसान हुआ हो, उस हादसे की भयावहता नौ साल बाद भी कम नहीं होती। इसलिए इतने वर्षों के बाद दोषियों को उनके किए की सजा दी गई है, तो यह कम नहीं है। अभियोजन की तारीफ करनी चाहिए कि शुरुआत में कोई सुराग न होने के बावजूद एक-एक कड़ी जोड़कर उसने आरोपियों को शिकंजे में कसा। हालांकि यह कम अफसोसनाक नहीं है कि इस हमले की साजिश रचने वाले लश्कर के आतंकी आजम चीमा समेत अन्य आतंकवादियों को अभी तक पकड़ा नहीं जा सका है।

इसके बावजूद यह आश्वस्त करता है कि जो लोग पाकिस्तान के खूनी इरादों को अंजाम दे रहे थे, उनमें से ज्यादातर को उनके अपराध की सजा मिली है। उनके बचाव का यह तर्क मायने नहीं रखता कि वे लश्कर या आईएसआई की साजिश पर महज अमल कर रहे थे। यह गौर करने वाली बात है कि अदालत ने अपनी टिप्पणी में इन्हें 'मौत के सौदागर' कहा है। इस हमले की साजिश पाकिस्तान में बनने के बावजूद इस्लामाबाद ने इसकी जांच में हमारी मदद नहीं की, तो इसे समझा जा सकता है। उसका चरित्र है कि वह हाफिज सईद और जकीउर रहमान लखवी जैसों को खुला छोड़ता है, और भारत में पकड़े जाने पर कसाब और नावेद से पल्ला झाड़ लेता है। ऐसे में, हमें पाक प्रायोजित आतंकवाद को सख्त जवाब तो देना ही होगा, देश के अंदर आतंकी गतिविधियों को होने देने से भी रोकना होगा। उतना ही जरूरी यह है कि ऐसा माहौल कतई न बनने न दिया जाए, जिससे अलगाववादियों का मन बढ़े।
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