कर्ज के बोझ से दबे ग्रीस के लोगों ने महज नौ महीने के भीतर हुए दूसरे आम चुनाव में उन्हीं एलेक्सिस सिप्रास की वामपंथी पार्टी पर भरोसा जताया है, जिन्होंने बेहद मजबूरी में कर्जदाता देशों के भारी दबाव में खर्च में और कटौती किए जाने की हामी भर दी थी।
रविवार को हुए आम चुनाव में मिली जीत के बाद साफ हो गया है कि सिप्रास प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे। ग्रीकवासियों ने इसी वर्ष हुई रायशुमारी में खर्च में और कटौती करने की मांग को खारिज कर दिया था, मगर सिप्रास ने भारी-भरकम शर्तों वाला बेलआउट पैकेज स्वीकार करते हुए ग्रीस को यूरो जोन से बाहर जाने से बचा लिया था। हालांकि इसी की वजह से उनकी पार्टी में भी बगावत हो गई, नतीजतन उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।
लेकिन चुनाव के नतीजे बताते हैं कि ग्रीस के पास इस वक्त सिप्रास से बेहतर विकल्प नहीं है। सिप्रास की पार्टी और उसकी सहयोगी नेशनलिस्ट ग्रीक इंडिपेंडेंट ने तीन सौ सीटों वाली संसद में आधी से अधिक सीटें हासिल की हैं। वहीं सिप्रास से बगावत कर अलग पार्टी बनाकर मैदान में उतरे पुराने सांसदों में से एक भी जीत नहीं सके! नतीजों से यह भी साफ है कि सिप्रास ने जीत जरूर हासिल की है, पर उनके पास कमजोर बहुमत होगा। उनकी असली चुनौती तो अब शुरू होगी।
बेशक अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं के आगे झुकते हुए सिप्रास ने यदि 85 अरब यूरो के तीसरे कर्ज पैकेज को स्वीकार नहीं किया होता, तो ग्रीस को दिवालिया होने से रोक पाना मुश्किल था। मगर ग्रीस का संकट यह है कि उसे जो भी पैकेज मिलता रहा है, उसका बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज को चुकाने में खर्च हो जाता है। बेरोजगारी को नियंत्रित नहीं किया जा सका है। पेंशन और करों में पहले ही काफी कटौती हो चुकी है।
कर्ज के संकट के साथ ही सिप्रास को अब पश्चिम एशिया में मची उथल-पुथल से उपजे शरणार्थी संकट से भी जूझना होगा। इस सच्चाई के बावजूद कि उन्हें तुरंत आर्थिक सुधारों पर काम करना होगा, वह अकेले इस चुनौती से नहीं निपट सकते। अमीर देशों को भी इस पर गौर करना चाहिए कि महज पांच वर्ष में छह चुनाव देख चुके ग्रीस के लिए इस वक्त राजनीतिक स्थिरता के साथ ही आर्थिक मजबूती हासिल करना भी जरूरी है।