चीन की अर्थव्यवस्था के भीतर क्या कुछ चल रहा है, यह शायद पूरी तरह सामने न आ पाए, पर शंघाई के शेयर बाजार में हड़कंप मचते ही मुंबई शेयर बाजार के सेंसेक्स सहित एशिया के तमाम सूचकांक जिस तरह धराशायी हो गए, वह खतरे की घंटी तो है ही। एक दिन में ही मुंबई शेयर बाजार में निवेशकों के सात लाख करोड़ रुपये डूबने के अंदेशे से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह मार कितनी बड़ी है।
अधिक दिन नहीं हुए, जब यह उम्मीद की जा रही थी कि मुंबई का सेंसेक्स कब 30 हजार के आंकड़े के पार जाता है, लेकिन सोमवार की गिरावट के बाद वह 25741.56 पर आ गया। जाहिर है, इस झटके से उबरने में उसे वक्त लगेगा, और अभी तो यह भी पता नहीं है कि अगले कुछ दिनों में शंघाई सहित दुनिया के दूसरे बाजार किस तरह का व्यवहार करते हैं।
धुर वामपंथी अर्थव्यवस्था से स्टेट कैपिटलिज्म की राह पकड़ चुके चीन ने आर्थिक सुधारों को तो ढाई दशक पहले अपना लिया था, लेकिन इसके साथ ही उसने डॉलर के मुकाबले युआन की कीमत को भी लंबे समय तक स्थिर रखा हुआ था। उसने पिछले दो दशकों में पहली बार जब पिछले पखवाड़े डॉलर के मुकाबले अपनी मुद्रा का सबसे बड़ा अवमू्ल्यन किया, तब जाकर पता चला कि भीतर कुछ गड़बड़ है। उसके इस कदम से एक डॉलर 6.2 युआन से बढ़कर 6.39 युआन का हो गया।
यह निर्णय चीनी निर्यातकों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया, क्योंकि खासतौर से चीन के फैक्टरी सेक्टर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही थी, लेकिन उसकी यह युक्ति उलटी पड़ गई लगती है। अर्थशास्त्र के पंडित आकलन कर रहे होंगे कि आखिर निवेशकों का भरोसा कैसे टूटा और शायद वे यह भी देख रहे होंगे कि यह संकट 2008 की मंदी की तुलना में कितना बड़ा है।
मगर ध्यान रहे कि यह संकट 2008 की मंदी से इस मामले में तो अलग है ही कि यह यूरोप या अमेरिका से नहीं, बल्कि चीन से उपजा है, जिसे अभी वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी माना जा रहा है। हालांकि रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती का भरोसा जताया है; लेकिन चूंकि सरकार का जोर इस वक्त सुधारों और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों पर है, लिहाजा सतर्क रहने की जरूरत है।