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मितव्ययिता का मंत्र

Fri, 31 Oct 2014 07:42 PM IST
नई दिल्ली
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बड़ा आर्थिक सुधार न करने के बावजूद जब अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर है, तब सरकारी खर्च में कटौती करने का वित्त मंत्री अरुण जेटली का फरमान थोड़ा चकित करता है। बल्कि सरसरी तौर पर उनका यह फैसला यूपीए के पूर्ववर्ती वित्त मंत्री पी चिदंबरम की नीतियों का अनुकरण करने का एक और उदाहरण मालूम होता है।
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इससे पहले जेटली के केंद्रीय बजट में भी चिदंबरम की छाप देखी गई थी। पर इससे आगे दोनों में कोई समानता नहीं है। चिदंबरम ने सरकारी खर्च में कटौती करने का फैसला आर्थिक हताशा के बीच किया था। इसी कारण उन्होंने गैरयोजनागत खर्च के साथ योजनागत खर्च में भी कटौती का कदम उठाया था, जिसका अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा था। जबकि जेटली ने सिर्फ गैरयोजनागत खर्च में कटौती करने की बात कही है।

फौरी तौर पर इसकी दो वजहें हैं-एक तो यही कि अप्रैल से सितंबर तक राजकोषीय घाटा बजट के समय व्यक्ति गए अनुमान का 82.6 प्रतिशत हो चुका है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह घाटा बजट अनुमान का 76 फीसदी था। ऐसे में, साल के अंत तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.1 फीसदी पर और 2016-17 तक तीन फीसदी पर ले आने का लक्ष्य आसान नहीं है।
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दूसरा, इस दौरान हुए खर्च में योजनागत व्यय 2.26 लाख करोड़ की तुलना में 6.15 लाख करोड़ का गैरयोजनागत व्यय बहुत ज्यादा है। अच्छा बजट प्रबंधन वह है, जिसमें गैरयोजनागत खर्च को यथासंभव कम रखने की कोशिश की जाए। मोदी सरकार के दौर में आर्थिक मुश्किलें एक के बाद एक कम होती गई हैं; विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम घटने से लेकर अपने यहां थोक और खुदरा मूल्य सूचकांक में आई रिकॉर्ड गिरावट में इसे देखा जा सकता है।

इसके अलावा खुद सरकार ने भी बेहतर आर्थिक माहौल बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं; शेयर बाजार में आए उछाल से भी इसे देखा जा सकता है। इसके बावजूद शुरुआती छह महीने में राजकोषीय घाटे को कम करने में उसका रिकॉर्ड पूर्ववर्ती यूपीए सरकार से खराब है, तो यह चौंकाता है।

इसी को देखते हुए सरकार ने समय रहते गैरजरूरी खर्च पर लगाम लगाने का फैसला लिया है। मौजूदा आर्थिक स्थितियों और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से उम्मीदें पैदा होती हैं, पर फिजलूखर्ची रोकने के इस कदम का वास्तव में कितना लाभ होता है, यह तो वित्त वर्ष के अंत में ही पता चलेगा।
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