तानाशाही और कट्टरवाद किसी मुल्क को कैसे बर्बाद कर देते हैं, मालदीव इसका ताजा उदाहरण है, जहां लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए पहले राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद को पद छोड़ने के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए भागना पड़ रहा है! यह भले ही मालदीव का आंतरिक मामला है, लेकिन यह भी सच है कि इस बहाने राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें दौड़ से बाहर करने की साजिश रची जा रही है।
जिस देश में अब्दुल गयूम तीन दशकों तक बिना किसी विपक्ष के अपनी तानाशाही चलाते रहे, वहां कानून का राज अचानक इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया कि एक न्यायाधीश की गिरफ्तारी चौवन प्रतिशत वोटों के साथ सत्ता में आए राजनीतिक दल पर भारी पड़ गई? जिस शख्स को गयूम की तानाशाही का विरोध करने के कारण पंद्रह साल जेल में बिताने पड़े हों और जो वहीं से चुनाव जीतकर सत्ता तक पहुंचा हो, जिसने मालदीव के अस्तित्व पर आए संकट के बारे में दुनिया को बताया हो, वह आज इतना बड़ा खलनायक हो गया है कि माले उसे गिरफ्तार करने के लिए भारत से टकराने से भी बाज नहीं आ रहा।
ज्यादा दिन नहीं हुए, जब माले हवाई अड्डे के पुनर्निर्माण में लगी एक भारतीय कंपनी को जायज अनुबंध के बावजूद वहां से बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ा था। दरअसल बदलते मालदीव को अब न सिर्फ भारत की जरूरत नहीं है, बल्कि वहां चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत-विरोध बढ़ रहा है। इस कारण भी नाशीद के भावुक समर्थन में उतरी हमारी सरकार को समझदारी से काम लेना चाहिए।
यह स्वीकार कर लेने में हर्ज नहीं है कि मालदीव के बदले रुख के पीछे विदेश नीति के मोर्चे पर हमारी नाकामी जिम्मेदार रही है। ढाई दशक पहले जिस देश ने तख्तापलट को नाकाम करने के लिए हमसे मदद ली थी, आज वही मुल्क हमसे आंखें क्यों फेर रहा है? इसीलिए हिंद महासागर के इस द्वीप देश के रणनीतिक महत्व को देखते हुए हमें ऐसा कोई कदम उठाने से बचना चाहिए, जिसका भविष्य में हमें ही नुकसान हो।
नाशीद के बहाने मालदीव में लोकतंत्र के पक्ष में लड़ाई तो ठीक है; राष्ट्रमंडल भी वहां आगामी चुनाव में पारदर्शिता की मांग कर ही रहा है, ऐसे में उचित तो यही होगा कि इस मामले में हम खुद को नैतिक समर्थन तक ही सीमित रखें।