किसी ने सोचा न होगा कि कांग्रेस-एनसीपी शासित महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीति इतनी तेजी से बदलेगी कि भविष्य तो छोड़िए, उसका वर्तमान तक अस्थिर हो जाएगा! सीटों के तालमेल पर बात न बनने से भाजपा ने शिवसेना का साथ क्या छोड़ा, एनसीपी ने भी कांग्रेस से समर्थन वापस ले लिया, जिसके बाद मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को भी इस्तीफा देना पड़ा।
कहां तो सर्वेक्षणों में भाजपा-शिवसेना गठजोड़ को बहुमत मिलने का दावा किया जा रहा था, कहां अब राज्य में पंचकोणीय मुकाबला होने की नौबत आ गई है। महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस-एनसीपी के बीच तालमेल नहीं था, पर भाजपा-शिवसेना का गठजोड़ टूटने के बाद जिस तेजी से एनसीपी ने समर्थन वापस लिया, वह हैरत में डालने वाला है। मराठी अस्मिता के नाम पर अब वह शिवसेना से हाथ मिलाती है या भाजपा से गठजोड़ करती है, यह देखने वाली बात है। लेकिन पृथ्वीराज चव्हाण सरकार की जो छवि बनी, उसमें अलग-अलग लड़कर दोनों की और दुर्गति ही होनी है।
इसमें शक नहीं कि महाराष्ट्र को राजनीतिक अस्थिरता में झोंकने के पीछे भाजपा-शिवसेना ही ज्यादा जिम्मेदार हैं। लेकिन उनके अलग होने के सिवा और रास्ता क्या था? उद्धव ठाकरे की जिद की आलोचना करने वाले भूलते हैं कि महाराष्ट्र में भाजपा की पिछलग्गू हो जाने का मतलब शिवसेना की राजनीति का खत्म हो जाना था।
चुनाव में मराठी एकता और अस्मिता का मुद्दा उठाने का उसे कितना लाभ मिलता है, यह पता नहीं, पर यह चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव की जगह तो तय कर ही देगा। भाजपा को इससे पहले भी शिवसेना के साथ ऐसी ही चुनौतियों से जूझना पड़ता था, पर इस बार उसके पास महाराष्ट्र का कोई बड़ा जमीनी नेता नहीं था, तिस पर मोदी लहर ने भी उसे लचीला होने से रोका।
विदर्भ सहित ग्रामीण इलाकों में उसकी पहले से पकड़ है, अब शहरी इलाकों में भी लाभ मिलने की वह उम्मीद कर रही है। पहले जो उत्तर भारतीय शिवसेना के कारण उससे छिटकते थे, वे अब उसे वोट दे सकते हैं। पर जिस राज्य में पिछले डेढ़ दशक की राजनीति इन दो गठबंधनों के इर्द गिर्द घूम रही थी, वहां समीकरण पूरी तरह उलट-पुलट गए हैं। ऐसे में मनसे जैसी पार्टी के पौ-बारह हो सकते हैं, और सत्ता के लिए कोई नया गठजोड़ भी बन सकता है। लेकिन वह महाराष्ट्र में राजनीतिक स्थिरता की गारंटी शायद ही हो।