आय से अधिक संपत्ति मामले में जयललिता को सजा होने में बेशक अट्ठारह साल लगे हों, पर इससे फिर साफ हुआ है कि कानून की नजर में एक आम आदमी और मुख्यमंत्री में कोई फर्क नहीं है। इस मामले में खुद को निर्दोष बताने की जयललिता ने कम कोशिशें नहीं की थीं। मुकदमे को बदले की राजनीति से प्रेरित बताने के अलावा सच्चाई सामने न आने देने के सुनियोजित प्रयास भी उन्होंने बहुत किए, जिस कारण मामले को राज्य से बाहर ले जाना पड़ा। पर बंगलूरू की विशेष अदालत ने आखिरकार सुबूतों और गवाहों की रोशनी में उन्हें दोषी पाया। इसके बाद भी ऊपरी अदालत में जाने का विकल्प तो उनके पास है ही।
जयललिता पहली ऐसी शख्सियत हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए जेल जाना पड़ा है। यही नहीं, उनका यह हश्र तब हुआ है, जब सत्ता में वापसी के बाद उनके सामने कोई चुनौती नहीं थी, और आम जनता के हित में कदम उठाने के कारण वह लोकप्रियता के शिखर पर थीं। ऐसे में, अदालत का यह फैसला खासकर सत्ता से जुड़े तमाम ताकतवर लोगों के लिए सबक है, जो यह समझते हैं कि कानून से आंखमिचौली खेलने में वे सफल हो जाएंगे। तब तो यह और संभव नहीं, जब हाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती का माहौल बना है।
पिछले वर्ष जुलाई में सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून के उस प्रावधान को निरस्त कर इस दिशा में एक बड़ी पहल की, जो किसी भी आपराधिक मामले में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा पाने वाले जनप्रतिनिधि की अपील लंबित रहने तक उसे संबंधित सदन का सदस्य बने रहने की छूट देता था। इसी कारण लालू प्रसाद और रशीद मसूद जैसों की सदस्यता गई, और इसी वजह से अब जयललिता की विधानसभा सदस्यता और मुख्यमंत्री की कुर्सी गई है।
हालांकि चारा घोटाले के कारण जेल जाने वाले लालू प्रसाद जमानत पर छूटकर खुद को सांप्रदायिकता-विरोध की राजनीति का मसीहा साबित करने की जैसी कोशिश करते हैं या शिक्षक भर्ती घोटाला में जेल जाने वाले ओम प्रकाश चौटाला अस्वस्थ होने के कारण जमानत पर बाहर आकर जिस तरह राजनीतिक रैली करते हैं, उनसे लगता नहीं कि उन्हें अपने किए का बहुत अफसोस है। इसके बावजूद मानने का ठोस कारण है कि भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों के खिलाफ होती कार्रवाई हमारे राजनीतिक वर्ग को अब कुछ भी गलत करने से रोकेगी।