भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर से सटी सरहद पर 2003 से संघर्ष विराम लागू है, इसके बावजूद पाकिस्तान ने कभी उसका सम्मान नहीं किया और समय-समय पर उसकी ओर से भड़काने वाली कार्रवाई होती रही है। लेकिन यह पहला मौका है, जब अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा के आसपास हो रही गोलाबारी ने एक दशक पुराने संघर्ष विराम को बेमानी-सा कर दिया है।
जम्मू-कश्मीर की सरहद पर स्थित तकरीबन सभी चौकियों पर गोलाबारी हो रही है, जिसके कारण हजारों लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाना पड़ा है। यह बेहद त्रासद है कि भीषण बाढ़ की तबाही के बाद सरहद के नजदीक स्थित लोगों को गोले और मोर्टार झेलने पड़ रहे हैं, जिसमें अनेक निर्दोष लोग मारे गए हैं।
इसमें दो राय नहीं कि दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए बातचीत से अच्छा दूसरा कोई तरीका नहीं हो सकता, लेकिन यह बातचीत गोलाबारी के माहौल में हर्गिज नहीं हो सकती। भारत का यह स्पष्ट रुख रहा है कि हिंसा और बातचीत साथ साथ नहीं चल सकती, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है।
अभी तक यह माना जाता रहा है कि पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को वहां की सेना, आईएसआई और कट्टरपंथी ताकतें भारत से रिश्ता सामान्य नहीं करने देतीं। मगर जिस तरह से पहले तो पाकिस्तानी उच्चायोग ने दोनों देशों के विदेश सचिवों की प्रस्तावित बातचीत से ऐन पहले हुर्रियत नेताओं की मेजबानी की और उसके बाद वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे को छेड़ने की कोशिश की थी, उससे यह धारणा टूटी है।
नवाज शरीफ इस वक्त घरेलू मोर्चे पर भी चौतरफा घिरे हुए हैं। और ऐसा लगता है कि वह भारत के साथ बेहतर रिश्ता कायम करने का मौका खोते जा रहे हैं और कारगिल युद्ध के दौरान हुई जैसी चूक फिर कर रहे हैं। संभवतः ऐसा इसलिए है कि पाकिस्तान की मूलतः संरचना ही इस तरह की है कि वह भारत के साथ मित्रवत संबंध नहीं रखना चाहता।
पाकिस्तान पर फाइटिंग टू द ऐंडः द पाकिस्तानी आर्मीज वे ऑफ वॉर की लेखिका सी क्रिस्टीन फेयर ने अपनी किताब में इसे ठीक ही आत्मघाती राज्य करार दिया है! इसके बावजूद दोनों देशों के साथ ही क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के हक में यही अच्छा है कि सरहद पर फैला तनाव जल्द से जल्द खत्म हो।