सीबीआई के गठन को असांविधानिक बताता गौहाटी उच्च न्यायालय का फैसला स्तब्ध करने वाला है। उसने यह निर्णय नवेंद्र कुमार की उस याचिका की सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सीबीआई के गठन को चुनौती दी गई थी।
करीब छह साल पहले गौहाटी उच्च न्यायालय की ही एक सदस्यीय पीठ ने वह याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन अब न्यायमूर्ति आई ए अंसारी और न्यायमूर्ति इंदिरा शाह की खंडपीठ ने गृह मंत्रालय के 1963 के उस संकल्प को ही गैरकानूनी करार दिया है, जिसके तहत सीबीआई के गठन का दावा किया जाता रहा है। अदालत ने दस्तावेजों की रोशनी में यह टिप्पणी की कि सीबीआई न तो दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट का अंग है, न ही इसका हिस्सा। इसका गठन न तो संयुक्त कैबिनेट का फैसला था और न ही इसके गठन को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी, जबकि इस तरह की एक केंद्रीय जांच एजेंसी का गठन कानून बनाकर ही होना चाहिए था।
अदालत का मंतव्य है, कि चूंकि ऐसा नहीं किया गया, इसलिए सीबीआई न तो पुलिस की तरह व्यवहार कर सकती है, न वह अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर सकती है और न ही उसे किसी की गिरफ्तारी करने का अधिकार है। गौहाटी उच्च न्यायालय के इस फैसले को केंद्र सरकार ने अगर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का संकेत दिया है, तो यह बिल्कुल भी अस्वाभाविक नहीं है।
जिस समय सीबीआई को केंद्र सरकार के दखल से बाहर लाने की जरूरत खुद सर्वोच्च न्यायालय बता रहा है, वह उसे पिंजरे में बंद तोता तक बता चुका है, और हाल के वर्षों में उसने कई बड़े घोटालों की जांच जिस तरह सीबीआई की निगरानी में करने के फैसले दिए, ठीक उसी समय उच्च न्यायालय ने यह हैरान करने वाला फैसला दिया है। इसलिए यह भी साफ है कि सीबीआई के गठन से संबंधित निर्णायक फैसला काफी महत्वपूर्ण और दूरगामी नतीजे वाला होगा।
इस मामले में अंतिम फैसला चाहे जो भी हो, लेकिन फिलहाल जरूरी यह है कि राजनीतिक दल इस पर फौरी टिप्पणी करने से बचें। केंद्र की सत्ता में चूंकि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ही सबसे अधिक समय तक रही है, लिहाजा उस पर सीबीआई के सर्वाधिक दुरुपयोग का आरोप गलत नहीं है, लेकिन केंद्र में जो भी सरकारें रही हैं, सभी ने इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल तो किया ही है। ऐसे में, इस जरूरी मुद्दे को राजनीतिक लाभ-हानि का मामला बनाने से बचना चाहिए।