अखिलेश यादव ने करीब साल भर पहले जब सबसे युवा मुख्यमंत्री के रूप में उत्तर प्रदेश की कमान संभाली थी, तब उम्मीद की गई थी कि वह कानून-व्यवस्था के लिए बदनाम रही समाजवादी पार्टी की पिछली सरकारों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करेंगे। मगर दो दिन पहले प्रतापगढ़ में हुआ खूनी संघर्ष यह बताने के लिए काफी है कि देश के सबसे बड़े सूबे में सब कुछ ठीक नहीं है।
अपने रसूख और आपराधिक पृष्ठभूमि के लिए बदनाम रहे रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने भले ही मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया हो और मुख्यमंत्री ने घटना की सीबीआई जांच के आदेश दिए हों; मगर यह हकीकत नहीं झुठलाई जा सकती कि कुंडा में जिन लोगों के बीच संघर्ष हुआ और जिसमें एक प्रधान और उसके भाई की हत्या कर दी गई, वे सब सत्तारूढ़ सपा और राजा भैया के करीबी लोग ही थे।
उनसे टकराने की कीमत जांबाज डीएसपी जियाउल हक को जान देकर चुकानी पड़ी है। जियाउल हक को पिछले कुछ समय से धमकियां मिल रही थीं। वह ऐसे अकेले अधिकारी नहीं हैं, और न ही राजा भैया सरकारी महकमे को जागीर समझने वाले पहले मंत्री। हकीकत यह है कि सूबे में कानून व्यवस्था की स्थिति बदहाल होती जा रही है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब विधायकों और मंत्रियों ने अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से धमकाया है।
ताजा मामला तो उन्हीं विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह से जुड़ा है, जिन्हें मुख्यमंत्री ने एक सीएमओ को अगवा करने की वजह से मंत्रिमंडल से हटा दिया था, मगर उन्हें दोबारा शामिल कर लिया। यही पंडित सिंह अब गोंडा की युवा जिलाधिकारी के अतिक्रमण विरोधी अभियान का विरोध कर रहे हैं!
यह उत्तर प्रदेश की बदकिस्मती ही है कि सरकार किसी की भी हो, उसमें कुछ ऐसे चेहरे जरूर शामिल हो जाते हैं, जो खुद ही कानून-व्यवस्था के लिए समस्या बने रहते हैं। इस घटना ने सर्वोच्च अदालत की उस टिप्पणी की ओर ध्यान खींचा है, जिसमें उसने सरकार से पूछा था कि जब अदालत से दोषी ठहराए गए लोगों को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है, तो आपराधिक मामलों में सजायाफ्ता विधायकों और सांसदों की सदस्यता खत्म क्यों नहीं की जाती। इस बारे में तमाम राजनीतिक दलों को जरूर सोचना चाहिए।