पिछले साल डीजल की कीमत को बाजार के हवाले करने के बाद अब केरोसिन को, आंशिक तौर पर ही सही, विनियंत्रित करने का फैसला लेकर सरकार ने जरूरी कदम उठाया है। अमीरों और मिलावटखोरों द्वारा नाजायज लाभ उठाने के बावजूद डीजल और केरोसिन की कीमत को सरकारी छत्रछाया से मुक्त करने में सरकारें झिझकती रही हैं, क्योंकि एक का इस्तेमाल कृषि क्षेत्र में होता है और दूसरे का प्रयोग हाशिये के लोग करते हैं।
हालांकि स्वीकार करना चाहिए कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के मूल्य कम होने के कारण भी केंद्र सरकार को ये कदम उठाने में आसानी हुई; डीजल को प्रशासनिक मूल्य प्रणाली से अलग करने के बाद तो उसके दाम कम भी हुए थे! केरोसिन को नियंत्रण मुक्त करने में सरकार ने हालांकि थोड़ी सावधानी बरती है।
उसने सिर्फ गैरपीडीएस यानी रंगहीन केरोसिन के भंडारण, ढुलाई और बिक्री पर से सरकारी प्रतिबंध हटाया है, जिसकी खपत पेंट, थिनिंग और ड्राई क्लीनिंग जैसे क्षेत्रों तक ही सीमित है। इसका लाभ यह होगा कि बाजार में इस श्रेणी के केरोसिन की उपलब्धता बढ़ेगी, नतीजतन गैरपीडीएस केरोसिन की कालाबाजारी पर अंकुश लगेगा, और जरूरतमंद लोगों को पीडीएस केरोसिन आसानी से उपलब्ध होगा।
इससे केरोसिन पर सरकारी सब्सिडी का बोझ तो कम होगा ही। अलबत्ता आर्थिक सुधार की इस दिशा में सरकार से थोड़े विवेकपूर्ण रवैये की उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हुई। डीजल को बाजार के हवाले करते वक्त भी ऐसी गुंजाइश रखनी चाहिए थी, जिससे इसका असर किसानों पर न पड़े, बल्कि उन पर पड़े, जो डीजल की बढ़ी कीमत चुकाने में समर्थ हैं।
अभी चूंकि कच्चे तेल के दाम तलहटी पर हैं, इसलिए डीजल की कीमत कम है, पर ऐसी स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली। तब खेती-किसानी की लागत महंगी होगी। इसी तरह पीडीएस केरोसिन से मुक्ति का लक्ष्य तो ठीक है, पर जिनके घरों में बिजली नहीं, सिर्फ उन्हीं को सब्सिडी का केरोसिन देने का फैसला उचित नहीं होगा।
ऐसे असंख्य लोग होंगे,जिनके घरों में बिजली होने के बावजूद वे केरोसिन को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने को विवश हैं। आर्थिक सुधार से किसी को इनकार नहीं है; फिर केरोसिन जैसे जीवाश्म ईंधन से मुक्ति का समर्थन कौन नहीं करेगा। लेकिन सब्सिडी कम करते हुए भी सरकार को अपनी कल्याणकारी भूमिका से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए।