दोहरे हत्याकांड के दोषी महेंद्रनाथ दास की मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने के सर्वोच्च अदालत के फैसले और 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में निचली अदालत द्वारा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार को बरी किए जाने के निर्णय में कोई साम्य नहीं है।
मगर ये दोनों फैसले अपराध न्याय प्रणाली की खामियों के साथ ही राजनीतिक दखलंदाजी को भी उजागर करते हैं। और फिर ये दोनों फैसले ऐसे समय सामने आए हैं, जब सर्वोच्च अदालत ने कोयला घोटाले से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए देश की शीर्ष अभियोजन एजेंसी सीबीआई को 'राजनीतिक आकाओं' से मुक्त करने की बात कही है।
महेंद्रनाथ दास की फांसी को उम्रकैद में बदलने का जो आधार सर्वोच्च अदालत ने बताया है, उसी से समझा जा सकता है कि दया याचिकाओं के मामले में सरकारें किस तरह काम करती हैं।
उसकी दया याचिका को पहले तो बरसों तक लटकाए रखा गया और जब तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया, तो उस पर अमल नहीं किया गया और कलाम की उत्तराधिकारी प्रतिभा पाटील के पास उनकी याचिका दोबारा भेजते समय यह जानकारी भी छिपा ली गई!
हमारे संविधान में राष्ट्रपति को आपराधिक मामलों के दोषियों को माफ करने का अधिकार मानवीय आधार पर दिया गया है, लेकिन ऐसे मामले अक्सर राजनीतिक कारणों से लटकाए जाते हैं। मगर इस मामले ने एक नजीर कायम कर दी है कि अब गैरआतंकी मामलों में दया याचिकाओं के निपटारे में विलंब सजा में माफी का आधार बन सकता है।
जहां तक सज्जन कुमार को बरी किए जाने की बात है, तो उन्हें 'संदेह का लाभ मिला' है। बेशक इस मामले में अदालत ने कुछ लोगों को दोषी ठहराया है, लेकिन इसके बावजूद सिख दंगा पीड़ित खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं, तो यह समझने की जरूरत है कि दंगों के तीस बरस बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिला है।
यह नहीं भूलना चाहिए कि दंगों के समय सज्जन कुमार न केवल उस क्षेत्र के सांसद थे, बल्कि कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। यह क्यों नहीं माना जाना चाहिए कि उनमें अभियोजन को प्रभावित करने की ताकत थी?
जिस तरह सीबीआई पर आज आरोप लग रहे हैं, उससे तो यह संदेह पुख्ता ही होता है। आखिर न्याय का मूलभूत सिद्धांत तो यही है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि न्याय होता दिखना भी चाहिए।