इसी महीने सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश का पदभार ग्रहण करने जा रहे न्यायमूर्ति पी सदाशिवम ने न्यायिक सुधार समेत दूसरे मुद्दों पर अपने जो विचार व्यक्त किए हैं, वे ध्यान देने लायक हैं। तमिलनाडु के एक किसान परिवार से निकलकर इस शीर्ष पद तक पहुंचने की उनकी यात्रा जितनी प्रेरणा जगाती है, न्यायिक शुचिता और पारदर्शिता के बारे में उनकी प्रतिबद्धता उतनी ही आश्वस्त भी करती है।
वह यह तो स्वीकारते हैं कि न्यायपालिका भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है, लेकिन साथ ही वह भ्रष्ट न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायत, उनकी शिनाख्त और उनके खिलाफ कार्रवाई को भी उतना ही जरूरी बताते हैं। उच्च न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखने का आग्रह उनमें इतना तीव्र है कि वह सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के अवकाशप्राप्त न्यायाधीशों को सरकार द्वारा गठित जांच कमेटियों का अध्यक्ष बनाए जाने के भी इस आधार पर विरोधी हैं कि उनकी रिपोर्टों को अक्सर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है!
लंबित मुकदमों के अंबार को त्वरित न्याय में बाधक अगर वह मानते हैं, तो यह बोझ कम करने के लिए उनके पास सुझाव भी हैं। उनके मुताबिक, हर फास्ट ट्रैक अदालत में अगर एक खास समय सीमा तक के लंबित मामलों को निपटाने की व्यवस्था बन जाए और औरतों व बच्चों के साथ होने वाली हिंसा के मुकदमों के निपटारे के लिए अलग अदालतें गठित हों, तो इस समस्या से एक हद तक निजात मिल सकती है।
त्वरित न्याय के लिए पिछले कुछेक वर्षों में अदालतों की संख्या बढ़ाने के साथ हालांकि नए इलाकों में भी अदालतें गठित की गई हैं, लेकिन मुकदमों का बोझ अब भी बहुत भारी है। इसकी एक वजह यह भी है कि बढ़ती अदालतों की तुलना में न्यायिक अधिकारियों की कमी एक बड़ी समस्या है। फिर भी उम्मीद करनी चाहिए कि नौ महीने के अपेक्षाकृत अपने छोटे कार्यकाल में मुकदमों का लंबित बोझ कम करने के लिए कुछ कदम वह जरूर उठाएंगे।
जब अधिकारों की लक्ष्मणरेखा का तर्क देकर कार्यपालिका न्यायिक जवाबदेही समेत कई कार्यकारी कदम उठाने की मंशा जता चुकी है, तब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसके अधिकारों के प्रबल समर्थक न्यायमूर्ति पी सदाशिवम की शीर्ष न्यायिक पद पर नियुक्ति वाकई महत्वपूर्ण है।