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पिटारे से तेलंगाना

Fri, 04 Oct 2013 11:37 PM IST
नई दिल्ली
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केंद्रीय मंत्रिपरिषद की मंजूरी के बाद तेलंगाना राज्य अपने गठन के एक कदम और नजदीक पहुंच गया है और यह स्पष्ट हो गया है कि यूपीए सरकार इस मुद्दे को और देर तक लटकाए नहीं रखना चाहती। कांग्रेस की तत्परता देखकर लगता है कि वह 'बांटो और राज करो' की नीति पर चल रही है, ताकि संभावित चुनावी नुकसान को कम से कम किया जा सके।
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असल में विभिन्न कारणों से अलोकप्रिय हो रही कांग्रेस के लिए दक्षिण का अपना यह किला बचाना मुश्किल हो रहा है, जिसने उसे पिछले लोकसभा चुनाव में 33 सीटें दी थीं। इसलिए उसने सोची-समझी रणनीति के तहत तेलंगाना के मसले को इस तरह आगे किया है, ताकि 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले यह अस्तित्व में आ जाए। जाहिर है, उसकी नजर न केवल तेलंगाना की 17 लोकसभा सीटों पर है, बल्कि इस नए राज्य के विधानसभा चुनाव पर भी होगी।

लेकिन राजनीतिक कारणों से लिए जाने वाले फैसले का नुकसान किस तरह हो सकता है, यह आंध्र प्रदेश में देखा जा सकता है, जहां तेलंगाना के मसले पर चार दशक से भी लंबे समय से चल रहे आंदोलन में पहले ही सैकड़ों जानें जा चुकी हैं और अब आंध्र का विभाजन बचाने के लिए लोग सड़कों पर हैं।
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असल में तेलंगाना के गठन में क्षेत्रीय विकास को आधार बनाकर दिए जाने वाले तर्क तब बेमानी हो जाते हैं, जब यह पता चलता है कि आंध्र प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में सर्वाधिक हिस्सा सिर्फ हैदराबाद का है। यह हड़बड़ी में लिए गए फैसले का ही नतीजा है कि हैदराबाद को दस वर्ष तक तेलंगाना और सीमांध्र, दोनों की संयुक्त राजधानी बनाए रखने का प्रावधान है, मगर अभी से इस पर विवाद शुरू हो गया है। आंध्र और रायलसीमा से आने वाले पल्लम राजू सहित चार वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफे से यह समझा जा सकता है कि यूपीए नेतृत्व को कांग्रेस के भीतर भी कम विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा, तिस पर जमानत पर जेल से बाहर आ चुके जगनमोहन रेड्डी बड़ी चुनौती बनकर सामने हैं। उसके लिए राहत की बात यही हो सकती है कि हाल ही में नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करने वाले चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश में भाजपा के लिए बहुत उपयोगी नहीं होंगे।

तेलंगाना के मसले पर अब पीछे नहीं लौटा जा सकता, लेकिन अच्छा तो यह होता कि विभिन्न क्षेत्रों से उठ रही मांगों को ध्यान में रखकर कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग के गठन पर विचार करती।
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