चंद्रयान अभियान के छह साल के भीतर इसरो ने पहली ही कोशिश में मंगलयान को लाल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर अगर अब तक की अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की है, तो विकसित दुनिया स्वाभाविक ही इसे अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते दबदबे का सुबूत मान रही है।
चंद्रयान के बाद इसरो ने जब मंगलयान की घोषणा की थी, तब आलोचकों में इसके पूर्व मुखिया जी माधवन नायर के अलावा ज्यां द्रेज जैसे अर्थशास्त्री भी थे। आलोचकों का एक वर्ग तब मामूली संसाधनों और पीएसएलवी के जरिये मंगल तक पहुंचने को असंभव मान रहा था, तो दूसरे वर्ग के लिए यह पैसे की बर्बादी थी। पर प्रतिभा और आत्मविश्वास के बूते भारत ने जो हासिल किया, वह चीन और जापान जैसी एशियाई ताकतों के लिए भी सपना ही है।
मंगल पर विजय वस्तुतः गहरे अंतरिक्ष में भारत का पहला सफल अभियान है; चंद्रयान की यात्रा चार लाख किलोमीटर की थी, जबकि मंगलयान ने लगभग अड़सठ करोड़ किलोमीटर का सफर तय किया है। तिस पर यह यात्रा जीएसएलवी का इंतजार किए बगैर जहां पीएसएलवी जैसे छोटे, लेकिन विश्वसनीय अंतरिक्ष यान के जरिये संभव हुई, वहीं मंगलयान तक आते-आते इसरो ने कंट्रोल सिस्टम में जिस तरह की महारत हासिल कर ली है, वह भविष्य के लिए बहुत आश्वस्त करने वाली है।
यह जरूर है कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की विकसित तकनीक और उसके एकाधिक मंगल अभियानों की पृष्ठभूमि में भारत के इस पहले मंगल अभियान का महत्व प्रतीकात्मक ही ज्यादा लगता है। लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी से संबंधित चंद्रयान की खोज को नासा समेत विकसित दुनिया ने गंभीरता से लिया था। फिर नासा जैसी एजेंसियां अपने अभियानों से जुड़े सारे ब्योरे सार्वजनिक नहीं करतीं। इसके अलावा मंगल के रहस्यों को खंगालने और उस पर जीवन की संभावना का पता लगाने के लिए इस तरह के अभियानों की निरंतर जरूरत भी है।
इस लिहाज से मंगलयान में लगे पांच उपकरणों के जरिये अगले छह महीनों में लाल ग्रह से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आने की संभावना बनती है। इस तरह के अभियानों से अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की मजबूत छवि तो बनती ही है, जिसका वाणिज्यिक पक्ष भी है, इससे इस क्षेत्र में शोध और अनुसंधान की नई संभावनाएं भी पैदा होती हैं।