आईसीसी द्वारा गठित न्यायिक आयोग ने भारतीय क्रिकेटर रविंद्र जडेजा के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों के बावजूद ब्रिटिश तेज गेंदबाद जेम्स एंडरसन को जिस तरह निर्दोष करार दिया है, वह दुर्भाग्यपूर्ण होने के साथ-साथ नस्लवादी सोच का भी उदाहरण लगता है।
आयोग का तर्क है कि एंडरसन की रविंद्र जडेजा के साथ हुई तकरार की वीडियो रिकॉर्डिंग न होने के कारण किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। पर टेस्ट क्रिकेट में हाल के वर्षों में कई बार वीडियो रिकॉर्डिंग न होने के बावजूद फैसले लिए गए हैं। फिर मौजूदा मामले में तो एंडरसन के खिलाफ ठोस सुबूत भी थे।
पहले टेस्ट मैच के दूसरे दिन जडेजा के खिलाफ लगातार अशालीन टिप्पणियां करते एंडरसन को अंपायर ने सख्त हिदायत दी थी। इसके बावजूद लंच के लिए लौटते हुए एंडरसन ने जब दोबारा जडेजा के साथ ऐसा बर्ताव किया और जवाब में जडेजा उनकी ओर लपके, तो भारतीय कप्तान धोनी ने बीच-बचाव किया। धोनी न सिर्फ इस घटना के गवाह थे, बल्कि उन्होंने आयोग के सामने गवाही भी दी। सबसे बड़ी बात यह कि सुनवाई के दौरान खुद ब्रिटिश तेज गेंदबाज ने स्वीकार किया कि उन्होंने जडेजा को अपशब्द कहे थे। क्या इसके बाद भी किसी सुबूत की जरूरत रह जाती है?
ऐसे में, यह क्यों न मानें कि ऑस्ट्रेलियाई न्यायिक आयुक्त ने इस मामले में पक्षपातपूर्ण आचरण किया है! गौरतलब है कि एंडरसन मौजूदा इंग्लैंड टीम के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जिन्होंने तीसरे टेस्ट में भारत को हराने में बड़ी भूमिका निभाई है। उनकी अनुपस्थिति में शेष दो टेस्ट में इंग्लैंड टीम के असंतुलित हो जाने का खतरा था। क्या इसलिए वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुपलब्धता का बहाना बनाकर एंडरसन को छोड़ दिया गया है?
भले ही आयोग के फैसले के खिलाफ बीसीसीआई को अपील करने का अधिकार न हो, पर एक भारतीय के आईसीसी प्रमुख होने के बावजूद धोनी और उनकी टीम को निशाना बनाने की यह घटना बहुत कुछ कह जाती है। यह मामला उस क्रिकेट का तो असम्मान है ही, जिसे भद्रजनों का खेल कहा जाता है, इंग्लैंड की जमीन पर घटी यह घटना इस खेल के जन्मदाता देश के बदलते नजरिये का भी क्षुब्ध करता उदाहरण है। ब्रिटिश मीडिया ने इस मामले में भारतीय कप्तान का मजाक उड़ाकर अपने जिस नस्लवादी नजरिये का साफ परिचय दिया है, उसकी तो जितनी भी निंदा की जाए, कम होगी।