आर्थिक सुधारों को बेताब यूपीए सरकार, ऐसा लगता है, कि दो मोरचों पर एक साथ काम कर रही है। एक तरफ वह निवेशकों को आकर्षित करने के लिए रुकावटों को दूर करना चाहती है, दूसरी ओर वनाधिकार कानून या भूमि अधिग्रहण, पुनर्स्थापन और पुनर्वास विधेयक जैसी पहलों की आड़ में जताना चाहती है कि उसने कल्याणकारी नीतियों को पूरी तरह नहीं छोड़ा है।
सड़क, रेल लाइन और बिजली जैसी बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं की मंजूरी के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय निवेश बोर्ड (एनआईबी) और वन तथा पर्यावरण सहित कुछ मंत्रालयों द्वारा किया जा रहा इसका विरोध सरकार के इसी अंतर्विरोध को दर्शाता है। मगर यह भी साफ है कि आर्थिक सुधार भूमि सुधार के बिना संभव नहीं है। असल में पेच इसी बात का है कि इन दोनों के बीच संतुलन कैसे साधा जाए।
विडंबना यह है कि आर्थिक सुधार और इधर चल पड़ी विकास की अवधारणा से सीधे तौर पर देश के ऐसे करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं, जिनके पास या तो जमीन नहीं है, या जिन्हें आसानी से बेदखल किया जा सकता है। उनके क्षेत्रों में विकास के नाम पर सड़कें और रेल लाइनें तो बिछाई जाती हैं, पर उसका इस्तेमाल वन-संपदा और कीमती अयस्कों को बाहर ले जाने के लिए किया जाता है।
इसमें दो मत नहीं कि देश में सड़क, रेल और बिजली की लाइनें बिछाने का काम अपेक्षित गति से नहीं हो सका है और इसमें तेजी लाने की जरूरत है। वित्त मंत्रालय चाहता है कि एनआईबी को वनाधिकार कानून के तहत ली जाने वाली अनिवार्य मंजूरी से मुक्त किया जाए। मगर इससे वनाधिकार कानून और पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों के साथ टकराव की स्थिति बन सकती है।
अभी तक का हमारा रिकॉर्ड बताता है कि बड़ी परियोजनाओं के लिए आदिवासियों और किसानों से जमीनें तो ले ली जाती हैं, पर अकसर उनके साथ छलावा ही किया जाता है। इसी का नतीजा है कि हजारों की संख्या में आदिवासियों, किसानों और खेतिहर मजदूरों को अपना हक मांगने के लिए दिल्ली का रुख करना पड़ता है।
हालांकि दिल्ली आ रहे इन भूमिहीनों को सरकार ने एक बार फिर मना लिया है। पर याद रखना चाहिए कि भूमि सुधार के लिए बनने वाले टास्क फोर्स की सफलता सरकार की नीयत पर निर्भर करेगी।