पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले के बाद आतंकी सरगनाओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने के मामले में पाकिस्तान से अब जिस तरह के संकेत आ रहे हैं, वे बहुत उत्साहित करने वाले नहीं हैं। पठानकोट हमले की पाकिस्तान ने सिर्फ निंदा ही नहीं की, बल्कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इसके मास्टरमाइंड के खिलाफ सख्त कार्रवाई की प्रतिबद्धता भी जताई थी। आतंकवादी पाकिस्तान से आए थे, और पाकिस्तान स्थित अपने आकाओं से बात करते रहे थे, इससे जुड़े कई सुबूत सिर्फ इस्लामाबाद को नहीं, बल्कि कई और देशों को भी सौंपे गए हैं।
जिस मसूद अजहर को इस हमले का दिमाग बताया जा रहा है, खुद उसने एक ऑडियो क्लिप जारी किया है, जिसमें भारत का मजाक उड़ाते हुए नवाज शरीफ सरकार से यह कहा गया है कि वह नई दिल्ली द्वारा सौंपे जा रहे सुबूतों को कतई स्वीकार न करे। इसके बाद भी अगर पाक सत्ता प्रतिष्ठान इन सुबूतों को नाकाफी मानते हुए भारत से 'ठोस सुबूत' मांगने के बारे में विचार कर रहा है, तो साफ लगता है कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में वह एक बार फिर से भारत और दुनिया की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश में है।
यही नहीं, इस समय पठानकोट हमले के बजाय भारत-पाक के बीच होने वाली विदेश सचिव वार्ता पर अधिक जोर देना भी उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है, ताकि वार्ता बाधित होने की स्थिति में भारत पर ठीकरा फोड़ा जा सके। जबकि अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने नवाज शरीफ को कहा है कि प्रस्तावित विदेश सचिव स्तर की वार्ता पर पठानकोट हमले की छाया न पड़े, यह सुनिश्चित करना पाकिस्तान की जिम्मेदारी है।
सच्चाई यह है कि प्रस्तावित वार्ता को स्थगित करना भारत के लिए ही ज्यादा नुकसानदेह होगा, क्योंकि पाकिस्तान से संवाद बंद हो जाने की स्थिति में उस पर दबाव बनाना मुश्किल हो जाएगा। जो पाकिस्तान इतने वर्षों में भी मुंबई हमले के आतंकी सरगनाओं के खिलाफ कार्रवाई न करके उन्हें छुट्टा घूमने देता है, उससे यह उम्मीद करना भोलापन ही है कि इतनी जल्दी वह पठानकोट हमले का ताना-बाना बुनने वालों को शिकंजे में कस लेगा। ऐसे में, बेहतर यही होगा कि इस्लामाबाद पर दबाव बनाने के साथ-साथ संवाद का रास्ता खुला रखा जाए।