प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार के सौ दिन पूरे होने से ऐन पहले जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ मिलकर द्विपक्षीय रिश्तों के एक नए अध्याय का आगाज किया है। इसका असर न केवल एशिया पर, बल्कि वैश्विक राजनीति पर भी पड़ना तय है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी ने जापान की यात्राएं की थीं और उसी दौरान दोनों नेताओं के बीच बेहतर तालमेल बन गया था, जिसकी परिणति दोनों देशों के बीच हुए महत्वपूर्ण समझौतों के रूप में देखी जा सकती है।
जापानी प्रधानमंत्री ने अगले पांच वर्ष में भारत में दो लाख दस हजार करोड़ रुपये के निवेश का वायदा कर नई दिल्ली के साथ बदलते रिश्ते के महत्व को ही रेखांकित किया है। इसके तहत आधारभूत संरचना, मैन्युफैक्चरिंग, स्मार्ट सिटी, स्वच्छ ऊर्जा और गंगा तथा अन्य नदियों की साफ-सफाई से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश होना है। प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी इन मुद्दों पर खासतौर से मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दे रहे हैं, क्योंकि इसमें निवेश का मतलब है नए रोजगार पैदा होना।
हालांकि दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग बढ़ाने पर सहमति हुई है, लेकिन अमेरिका की तरह का असैन्य समझौता नहीं हो सका है। यों जापान और भारत के रिश्ते काफी पुराने हैं, मगर क्योटो को काशी से जोड़कर मोदी ने इसे एक अलग आयाम देने की कोशिश भी की है। असल में वह प्रतीकों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं और जानते हैं कि इसका असर कितनी गहराई तक होता है। दोनों नेताओं ने सामरिक साझेदारी को विशेष सामरिक वैश्विक साझेदारी में बदलने की जो बात की है, उसका पूरा अर्थ अभी खुलना बाकी है।
इसके बावजूद एशिया की दूसरे और तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था की इस करीबी को एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के लिए चुनौती मानना जल्दबाजी होगी। खासकर इसलिए, क्योंकि भारत और चीन ब्रिक्स में सहयोगी हैं और डब्ल्यूटीओ जैसे मंचों पर उनके बीच तालमेल बना रहा है। भारत को खाद्य सुरक्षा के मसले पर डब्ल्यूटीओ में चीन के समर्थन की जरूरत भी है और संभवतः अगले हफ्ते जब वाणिज्य और व्यापार मंत्री निर्मला सीतारमन चीन यात्रा पर जाएंगी, तो यह मसला भी उठेगा। लेकिन मोदी ने जिस तरह से अपनी द्विपक्षीय यात्रा के लिए पहले बड़े देश के रूप में जापान को चुना, वह निश्चय ही भारत की विदेश नीति में आ रहे बदलाव का बड़ा संकेत है।