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ब्रिक्स से बढ़ती उम्मीदें

Thu, 09 Jul 2015 08:10 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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यूरोजोन में ग्रीस के कर्ज को लेकर चल रहे संकट के बीच रूस के उफा शहर में हो रहे एक के बाद एक ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलनों के महत्व को बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के बरक्स देखने की जरूरत है। यह कम हैरत की बात नहीं है कि रूस, चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के इस संगठन को पश्चिम के अमीर देश हाल तक हिकारत से देखते रहे हैं और ब्रिक्स को बेमेल गठजोड़ बताते रहे हैं। मगर अब इसी ब्रिक्स की साझा अर्थव्यवस्था अमेरिका की भारी-भरकम अर्थव्यवस्था को चुनौती देने की स्थिति में आ गई है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन में इन पांच देशों की साझा क्षमता की याद दिलाते हुए उनमें और सहयोग बढ़ाने की अपील की है। अभी वैश्विक कारोबार में इन देशों की 18 फीसदी की हिस्सेदारी है, जबकि इनमें दूसरे देशों के साथ ही, परस्पर व्यापार बढ़ाने की भी भारी संभावनाएं हैं। खासतौर से मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री ने भी किया है। इन देशों ने न्यू डेवलपमेंट बैंक के नाम से पहले ही विश्व बैंक जैसी पहल कर दी है, जिसके अगले वर्ष से सुचारु रूप से काम करने की संभावना है।

हालांकि ब्रिक्स का यह सातवां सम्मेलन है, लेकिन सच यह भी है कि अभी तक इन देशों के लोगों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में जैसा संपर्क होना चाहिए, वह नहीं हो सका है, खासतौर से कौशल विकास से लेकर सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक सहयोग के स्तर तक। इस सबके बीच सबसे बड़ी बात यह है कि ब्रिक्स देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने के साथ ही परस्पर विश्वास बढ़ाने की भी जरूरत है, जिसकी कमी देखी जा सकती है।
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मसलन, ब्रिक्स सम्मेलन की पृष्ठभूमि में जिस तरह से 26/11 के मुंबई हमले के वांछित आतंकी जकीउर रहमान लखवी के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में लाए गए प्रस्ताव पर चीन ने पाकिस्तान की तरफदारी की, उससे यही पता चलता है कि रिश्तों में कहीं कुछ फांस जरूर है। इसके उलट प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन के मसले पर प्रतिबंध झेल रहे रूस की तरफदारी करते हुए दो टूक कहा है कि मनमाने प्रतिबंधों से वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। जाहिर है, आर्थिक सहयोग के साथ ही आतंकवाद के मुद्दे पर स्पष्टता ब्रिक्स की मजबूती के लिए जरूरी है।
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