अमेरिकी नेतृत्व में शुरू हुए हवाई हमले के बावजूद आईएस (इस्लामिक स्टेट) ने एक ब्रिटिश बंधक का सिर कलम कर अगर फिर अपने दुस्साहस का परिचय दिया है, तो अब पाक तालिबान का उसके समर्थन में सामने आना उससे भी अधिक चिंताजनक है। तालिबान का अब तक अल कायदा से गठजोड़ रहा है।
आईएस से होड़ में पिछड़ रहे अल कायदा ने करीब एक महीना पहले भारतीय उपमहाद्वीप में जेहाद शुरू करने से संबंधित जो वीडियो जारी किया, उसे दोबारा अपना वर्चस्व हासिल करने की उसकी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें तालिबान उसका सहयोगी होता। अपने संबोधन में जवाहिरी ने अफगान तालिबान सरगना मुल्ला उमर के प्रति निष्ठा भी जताई थी। लेकिन अब पाक तालिबान ने आईएस के साथ मिलकर जेहाद को गति देने की जो अपील की है, उससे अफगान और पाक तालिबान के बीच खाई के और गहरे होने का तो संकेत मिलता ही है, अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों की विदाई के बाद इस पूरे इलाके में आतंकी संगठनों के पांव जमाने के खतरनाक इरादे का भी पता चलता है।
दरअसल पाकिस्तान-अफगानिस्तान का व्यापक इलाका अमेरिका-विरोध के लिए जाना जाता है, और यहां की विशाल आबादी जेहाद के नाम पर हथियार उठाने के लिए भी तैयार है। ऐसे में, दुनिया के दो दुर्दांत आतंकवादी संगठन अपने वर्चस्व की लड़ाई के लिए आने वाले दिनों में यदि इस इलाके को चुनते हैं, तो स्थिति की भयावहता की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। जहां तक आईएस की बात है, तो थोड़े ही समय में उसका भौगोलिक विस्तार जहां चौंकाने वाला रहा है, वहीं उसकी नृशंसता के ब्योरे दहशत पैदा करने वाले हैं। हालांकि न तो अल कायदा इस समय ऐसी स्थिति में है कि भारतीय उपमहाद्वीप में जेहाद के अपने इरादे को मूर्त रूप दे सके, और न ही पाक तालिबान इस हालत में है कि आईएस का बढ़-चढ़कर सहयोग कर सके। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि इस पूरे इलाके में आतंकवाद के बढ़ते खतरे की अनदेखी कर दी जाए।
पिछले दिनों कश्मीर में आईएस के झंडे देखे जाने की बात सामने आई, तो पश्चिम बंगाल के वर्दवान में बम विस्फोट की ताजा घटना को अल कायदा से जोड़कर देखा जा रहा है। जाहिर है, अपने आसपास आतंकवाद के बढ़ते खतरे को देखते हुए चौकस रहने की जरूरत है।