सरकारों की वादाखिलाफी का सर्वोच्च अदालत ने अपने एक ताजा फैसले में संज्ञान लिया है, जिसका इस चुनावी मौसम में खास महत्व है। केरल की तत्कालीन सरकार के 1990 में उद्योगों को पांच वर्ष तक निर्बाध बिजली आपूर्ति करने से संबंधित वायदे को पूरा न कर पाने से संबंधित इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह वचनबद्धता के सिद्धांत का उल्लंघन तो है ही, अनैतिक भी है।
इधर पिछले कुछ वर्षों में चुनावी घोषणा पत्रों में मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त बिजली से लेकर लैपटॉप, साइकिल, रंगीन टीवी, सोने की चेन, मिक्सर ग्राइंडर, मुफ्त खाद्यान्न देने तक के वायदों की जैसे झड़ी लगी हुई है। राजनीतिक दल ऐसे वायदों के लिए संविधान में दिए गए नीति निदेशक तत्वों की आड़ लेते हैं, जिसमें कहा गया है कि राज्य लोक कल्याण के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा। यही नहीं, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भी इस तरह की मुफ्त घोषणाएं भ्रष्ट आचरण के तहत नहीं आतीं।
अमूमन सरकारों के नीतिगत फैसलों पर न्यायपालिका दखल नहीं देती है, पर सरकारों में अपनी पार्टियों के राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने की होड़ लग गई है। ऐसी ही एक मुफ्त घोषणा को चुनौती देने वाली याचिका पर सर्वोच्च अदालत ने कुछ महीने पहले कड़ी टिप्पणी की थी कि मुफ्त सामान और सेवाएं देने वाली घोषणाओं ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को घोषणा पत्र में किए जाने वाले वायदों से संबंधित दिशा-निर्देश बनाने का आदेश भी दिया था। इसी आधार पर अभी चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों की राय भी मांगी है, जिससे उम्मीद है कि आगामी लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में इसका असर दिखे।
असल में सरकारें और राजनीतिक दल वायदे तो कर देते हैं, पर उन्हें पूरा करने के लिए उनके पास ठोस योजना नहीं होती। मगर जैसा कि सुझाव है, राजनीतिक दलों को अब घोषणापत्र में किए जाने वाले वायदों के साथ यह भी बताना होगा कि वे जो घोषणाएं कर रहे हैं, उन्हें पूरा करने के लिए संसाधन कहां से जुटाए जाएंगे। यदि अगले आम चुनाव में राजनीतिक दल इस पर अमल कर सके, तो यह चुनाव और राजनीतिक सुधार की दिशा में वाकई बड़ा कदम होगा।