रक्षा, ऊर्जा, खुदरा, दूरसंचार और पेट्रोलियम सहित अनेक क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा में ढील तथा अन्य तरह की रियायतें देने का यूपीए सरकार का फैसला आर्थिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन जिन परिस्थितियों में यह कदम उठाया गया है, उस पर सवाल उठने तय हैं।
असल में बीते कुछ वर्षों में सरकार ने खासतौर से खुदरा में एफडीआई को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है और वह लगातार यह जतलाने की कोशिश करती रही है कि इसके बिना आर्थिक तरक्की के सारे रास्ते बंद हो जाएंगे! मगर हकीकत यह है कि खुदरा में एफडीआई के लिए वालमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी न केवल दबाव बना रही थीं, बल्कि चाहती थीं कि यह फैसला उनके अनुकूल लिया जाए। जिस तरह से अभी सरकार ने स्थानीय, छोटे और मझोले उद्योगों से 30 फीसदी माल खरीदने की शर्त में रियायत देकर 20 फीसदी करने और दस लाख से कम आबादी के शहरों के लिए भी एफडीआई का रास्ता खोलने का फैसला लिया है, उसे इस दबाव का नतीजा क्यों नहीं मानना चाहिए?
आखिर खुदरा में एफडीआई का फैसला तो दस महीने पहले ले लिया गया था, और उसे संसद की भी मंजूरी मिल चुकी थी, लेकिन आज तक एक भी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने निवेश में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई? सरकार यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि यह फैसला राज्यों पर छोड़ा गया है, क्योंकि इस प्रतिस्पर्धी दौर में कोई भी राज्य आखिर कब तक बचा रह सकता है।
उसके ताजा कदम से तो देश के विशाल असंगठित क्षेत्र के सामने फिर वही चुनौतियां खड़ी हो गई हैं, जिनकी वजह से वह खुदरा में एफडीआई का विरोध करता रहा है। बात सिर्फ खोमचे वालों या छोटे किराना व्यवसायियों की नहीं है, किसानों को भी अब तक आश्वस्त नहीं किया जा सका है कि एफडीआई से उनके हितों पर आंच नहीं आएगी।
बेशक, आर्थिक सुधार देश की जरूरत हैं और ऊर्जा, दूरसंचार तथा बीमा जैसे क्षेत्रों में निवेश की काफी गुंजाइश भी है, लेकिन जिस तरह से देश की विकास दर के आंकड़े लगातार नीचे गिरते जा रहे हैं, उसमें यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि इससे स्थिति सुधर ही जाएगी। दरअसल सरकार एक तरह के असमंजस में भी दिखती है, एक तरफ तो वह आर्थिक सुधारों की बात करती है, दूसरी ओर उसे खाद्य सुरक्षा अध्यादेश जैसे कदम भी उठाने पड़ते हैं। हकीकत यह है कि इस सरकार के पास अब समय भी बहुत कम है।