कर संबंधी अपने कानून में पहली अगस्त तक संशोधन करने के स्विट्जरलैंड के आश्वासन से काले धन को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि फरवरी में यानी एनडीए सरकार के सत्ता में आने से पहले स्विस और भारतीय अधिकारियों के बीच कालेधन के संबंध में बात हुई थी और उसके बाद से उनमें किसी तरह का संपर्क नहीं हुआ है।
खुद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने माना है कि उनके मंत्रालय को अभी तक स्विस सरकार से भारतीय खातेदारों के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली है। इसके बावजूद मीडिया के एक हिस्से में कालेधन को लेकर इस तरह से खबर आई, मानो विदेशी बैंकों में जमा कथित धन अब बस वापस ही आने वाला है!
वास्तव में विदेशों में जमा कालेधन को लेकर जो हौव्वा खड़ा किया गया है, उससे कहीं अधिक कालाधन तो अपने देश में ही मौजूद है, जिसका सहज अंदाजा रियल एस्टेट और आभूषण जैसे क्षेत्रों के फलते-फूलते कारोबार से लगाया जा सकता है। स्विट्जरलैंड के केंद्रीय बैंक एसएनबी के मुताबिक वर्ष 2013 में स्विस बैंकों में जमा भारतीय खातेदारों का धन 43 फीसदी बढ़कर 14,000 करोड़ रुपये हो गया। हमारे देश में विदेशों में काले धन के जो आंकड़े बताए जाते रहे हैं, उसकी तुलना में यह काफी कम है।
अच्छी बात यह है कि एनडीए सरकार कालेधन को लेकर गंभीर है और उसने सत्ता में आने के बाद सबसे पहला कदम कालेधन की जांच के लिए विशेष जांच दल के गठन के रूप में उठाया था। मगर एसआईटी के अधिकारी भी बता रहे हैं कि उनकी जांच अभी एकदम शुरुआती स्तर पर है। दरअसल यह समझने की जरूरत है कि विदेशी बैंकों में जमा कालेधन की वापसी और कालेधन के स्रोतों पर अंकुश, ये दोनों अलग-अलग चीजें हैं।
चूंकि स्विट्जरलैंड पर भारत सहित अनेक देश लगातार दबाव डाल रहे थे, इससे बहुत संभव है कि वहां के कानून में बदलाव के बाद कुछ भारतीय खातेदारों के नाम सामने आ जाएं। मगर इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए व्यापक बदलावों की जरूरत है और इसकी शुरुआत राजनीतिक सुधारों के साथ की जानी चाहिए। सीएमएस नामक एक रिसर्च थिंकटैंक का आकलन है कि अभी हुए लोकसभा चुनाव में ही करीब 30,000 करोड़ रुपये खर्च हुए थे और इसमें से एक तिहाई काला धन था!