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कैसे रोकें दागियों को

Mon, 10 Mar 2014 07:26 PM IST
नई दिल्ली
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लोकसभा चुनावों के सरगर्म होते माहौल के बीच सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई अदालतों को सांसदों और विधायकों से संबंधित आपराधिक मामलों को एक वर्ष में निपटाने का महत्वपूर्ण आदेश दिया है। मामलों के शीघ्र नहीं निपटने और सुनवाई में कई-कई बरस लगने की वजह से आपराधिक मामलों में नामजद सांसद और विधायक पुनः निर्वाचित हो जाते हैं; अदालत ने इसी प्रवृत्ति का संज्ञान लिया है।
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यह बीमारी कितनी गंभीर है, इसका पता इस बात से चलता है कि जिस दिन सर्वोच्च अदालत ने यह आदेश दिया है, उसी दिन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिकॉर्ड ने आंकड़े जारी कर बताया है कि 16वीं लोकसभा चुनावों के लिए दो मार्च तक विभिन्न पार्टियों ने जिन 203 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए, उनमें से एक तिहाई के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं! और अभी तो यह शुरुआत है, जब पूरे 543 सीटों के उम्मीदवारों की घोषणा हो जाएगी, तब असली तस्वीर सामने आएगी।

यह गौर करने वाली बात है कि कुछ महीने पहले ही सर्वोच्च अदालत ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) को निरस्त करते हुए आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने पर सांसदों और विधायकों की सदस्यता तुरंत रद्द करने और उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाने संबंधी महत्वपूर्ण फैसला दिया था। इस आदेश के कारण ही चारा घोटाले में दोषी ठहराए जाने पर लालू प्रसाद यादव और जगदीश शर्मा की लोकसभा से सदस्यता तथा एमबीबीएस सीटों के घोटालों से संबंधित मामले में दोषी ठहराए गए राशिद मसूद की राज्यसभा से सदस्यता चली गई।
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मगर जिस तरह से आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को लोकसभा के टिकट दिए जा रहे हैं, उससे समझ में आता है कि यह चुनौती असल में कितनी बड़ी है। अभी निचली अदालतों में कुल तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिन्हें निपटाने के लिए महज 18,000 के आसपास जज हैं। इसके बावजूद निचली अदालतों से यदि विधायकों और सांसदों से संबंधित आपराधिक मामलों में एक वर्ष में फैसला आ जाएगा, तो काफी हद तक दागियों को संसद और विधानसभाओं में जाने से रोका जा सकेगा। अच्छा तो यह होता कि राजनीतिक दल खुद ही पहल कर आपराधिक मामलों में नामजद लोगों को टिकट देने से परहेज करते।
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