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कितने सरबजीत

Thu, 02 May 2013 09:09 PM IST
नई दिल्ली
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सरबजीत सिंह को आखिरकार वतन की मिट्टी नसीब हुई। लेकिन शरीर और मन के थके होने के बावजूद गले में मालाओं का बोझ थामे हाथ हिलाकर भीड़ का शुक्रिया अदा करते हुए भारतीय सीमा में उत्साह के साथ दाखिल होने और विशेष विमान से सरकारी प्रतिनिधियों की देख-रेख में फूलमालाओं में लपेटकर लाए जाने में फर्क है!
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सशरीर बेटियों के कंधों पर हाथ रखकर खुशी के आंसू पोंछते हुए लौटने और पड़ोसी मुल्क की चरम अमानवीयता के बीच लाश बनकर लौटने में बहुत फर्क है!

पाकिस्तान ने सरबजीत को मौत की ही सजा दी, हां, इतना रहम जरूर किया कि उसके शव को वतन लाने दिया। जीवित सरबजीत को वापस लौटाने में कानून की जो पेचीदगियां आड़े आ रही थीं, उसकी मौत ने वे सारी अड़चनें खत्म कर दीं।

क्या विडंबना है कि ओसामा बिन लादेन और दाऊद इब्राहिम का शरणदाता और हाफिज सईद जैसों का पालनकर्ता आतंकी हमले के जुर्म में एक ऐसे व्यक्ति को मौत की सजा देता है, जिसकी पहचान ही संदिग्ध थी।
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सैनिकों की आंखें निकाल लेने वालों या कोमा में चले गए कैदी की हालत पूछने पर हंसने वालों से आप मानवीयता की उम्मीद नहीं कर सकते, पर पाक जेल में बंद दूसरे भारतीयों की सुरक्षा जरूर सुनिश्चित कर सकते हैं।

लिहाजा 65 साल से हिंसा और अविश्वास के बंधक बने देशों को अपने उन अभागे नागरिकों के भविष्य के बारे में अब गंभीरता से जरूर विचार करना चाहिए, जो दोनों मुल्कों की जेलों में वर्षों से बंद हैं, और जिनकी रिहाई के लिए शुरू हुई पहल अधबीच में ही बाधित हो गई है।

रास्ता भटक जाते मछुआरों, अनजाने में सरहद लांघ जाते लोगों, और सरकारों द्वारा इस्तेमाल होते जासूसों का वोट बैंक नहीं होता, न ही अपनी सरकारों पर दबाव बना पाने की उनमें ताकत होती है। इसीलिए जिस दौर में तमाम सुबूतों के बावजूद दुर्दांत आतंकवादी सरगना छुट्टा घूमते हैं, और कुछ को रिहा किया जाता है, उस दौर में सरबजीत जैसों की किस्मत में बेगानी धरती पर मौत लिखी होती है।
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सरबजीत मामले में पाकिस्तान को बेनकाब करना चाहिए, लेकिन उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि अब किसी कैदी की नियति चमेल या सरबजीत सिंह जैसी न हो।
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