इस बार के विश्व कप फुटबॉल का सबसे बड़ा उलटफेर निश्चय ही पिछले चैंपियन स्पेन का पहले दौर में बाहर हो जाना है। उसके बाद हालांकि इंग्लैंड और इटली की टीमें भी बाहर हो गई हैं, पर इनका यह हाल बहुत चौंकाने वाला इसलिए नहीं है कि इस विश्व कप में इन दो यूरोपीय टीमों से उतनी उम्मीद नहीं थी, जितनी स्पेन से थी। लेकिन विगत उपलब्धियों के गर्व से चूर स्पेन ने न अपनी तकनीक बदली, न ही थके खिलाड़ियों को बदला।
इसी तरह अतिरिक्त रक्षात्मकता ने इटली की नैया डुबो दी। एक तर्क यह दिया जा रहा है कि लैटिन अमेरिका का गर्म वातावरण यूरोपीय टीमों को रास नहीं आ रहा। पर नीदरलैंड, जर्मनी, फ्रांस और बेल्जियम जैसी यूरोपीय टीमों ने ब्राजील में अब तक जिस आक्रामक फुटबॉल का प्रदर्शन किया है, उसे देखते हुए यह तर्क नहीं टिकता। यह तर्क इसलिए भी निराधार है कि लैटिन अमेरिकी जमीन पर ब्राजील, अर्जेंटीना और उरुग्वे जैसी टीमें भी अब तक बहुत प्रभावित नहीं कर पाई हैं। अर्जेंटीना लियोनल मेसी पर दयनीय तरीके से निर्भर है, तो ब्राजील की रक्षा पंक्ति बेहद जर्जर।
इनके बजाय अब तक जिन्होंने अपने प्रदर्शन से चौंकाया है, वे कोस्टारिका, कोलंबिया, बेल्जियम, अल्जीरिया, घाना और इक्वाडोर जैसी टीमें हैं। कोस्टारिका ने इटली और उरुग्वे जैसी दिग्गज टीमों को हराया और इंग्लैंड से ड्रॉ खेला, कोलंबिया ने अपने तीनों और बेल्जियम ने अपने दोनों मैच जीते, तो घाना ने उस आक्रामक जर्मन टीम को बराबरी पर रोक दिया, जिसने अपने शुरुआती मैच में क्रिस्टियानो रोनाल्डो की पुर्तगाली टीम को चार-शून्य से हराकर सनसनी फैला दी थी।
एशियाई टीम ईरान ने अर्जेंटीना के खिलाफ जिस खेल का परिचय दिया, वह खासकर उल्लेखयोग्य है। दरअसल कमतर समझी जानी वाली ये टीमें सितारों पर निर्भर नहीं हैं। इनमें ज्यादातर कम उम्र युवा हैं, जिन्हें खेलने का अवसर कम मिला है, इसलिए वे जोश से भरपूर हैं। दूसरी ओर, नामचीन टीमों के अनेक बड़े फुटबॉलर या तो थके हैं या चोटिल। इसीलिए यह फर्क दिख रहा है।
अनुभवी टीमें धीरे-धीरे जिस तरह अपने रंग में लौट रही हैं, उसमें यह तो नहीं कह सकते कि इसमें आखिरी दम तक कोई बड़ा उलटफेर हो ही जाएगा, पर इस विश्व कप का पहला चरण सामान्य समझी जाने वाली टीमों के असामान्य खेल के लिए जरूर याद रखा जाएगा।