आईपीएल से जुड़े विवादों और न्यूजीलैंड दौरे पर गई भारतीय टीम की लगातार पराजयों के बीच नारायणस्वामी श्रीनिवासन का आईसीसी के मुखिया के रूप में चुना जाना एक चौंकाने वाले घटनाक्रम के रूप में सामने है।
विश्व क्रिकेट में भारत की ताकत का पहली बार एहसास कराने वाले जगमोहन डालमिया भी इस मुकाम तक पहुंच चुके हैं, लेकिन यह पहली बार है, जब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में घोषित तौर पर भारत और इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया का सिक्का चलेगा। जब विश्व क्रिकेट के कुल राजस्व में भारत का योगदान सर्वाधिक है, तब आईसीसी के कार्यकलापों और फैसलों में उसकी बड़ी भूमिका होनी ही चाहिए थी, जो अब तक इतने स्पष्ट तौर पर नहीं दिखती थी।
परंतु श्रीनिवासन की इस उपलब्धि पर गर्व करने से पहले आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग की घटना और उनकी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के विवादों को नहीं भूलना चाहिए। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित मुद्गल कमेटी अभी जांच कर रही है।
फिर आईसीसी का मुखिया होने के साथ बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर बने रहने की जो इच्छा उन्होंने जताई है, उसका भी समर्थन नहीं किया जा सकता। जिस तरह आखिरी वक्त पर दक्षिण अफ्रीका को पाले में लाकर श्रीनिवासन ने अपने मन की कर ली, उसी तरह संभव है, आईसीसी और बीसीसीआई के शीर्ष पदों पर बने रहने के लिए वह कोई तर्क गढ़ें, पर यह निष्पक्षता और नैतिकता, दोनों के खिलाफ होगा।
आईसीसी की बैठक में क्रिकेट के जिस नए फॉरमेट पर सहमति बनी है, उस पर भी आशंकाएं कम नहीं हैं। टेस्ट शृंखलाओं के दो देशों की सहमति पर आयोजित होने का मतलब है कि हर देश के साथ खेलने की बाध्यता नहीं रहेगी।
विदेशी दौरों का कम होना भारत के लिए आर्थिक लिहाज से तो लाभप्रद होगा, लेकिन अपनी ही जमीन पर लगातार खेलना क्रिकेट की विविधता से वंचित रह जाना भी होगा। क्रिकेट खेलने वाले अनेक देश ऐसे हैं, जिनके यहां इतना बड़ा बाजार नहीं है। नए फॉरमेट में वे कहीं उपेक्षित न रह जाएं!
आईपीएल जैसे आयोजनों ने क्रिकेट की गरिमा को खत्म कर जिस तरह इसे तमाशे में तब्दील कर दिया है, उसके बाद क्रिकेट में केवल पैसे को महत्व देने का समर्थन नहीं किया जा सकता।