प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तीन जनवरी को अपनी बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि विपक्ष और मीडिया की तुलना में इतिहास उनके प्रति कहीं अधिक उदारता बरतेगा और उनके एक दशक लंबे कार्यकाल का आकलन करेगा। मगर हाल में ही आई दो किताबें, उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और पूर्व कोयला सचिव और कोयला घोटाले में आरोपी पी सी पारेख की क्रूसेडर आर कांस्पिरेटर इस बात की तस्दीक करती हैं कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र रूप से कोई फैसला नहीं ले सके।
चुनाव के समय आई इन दोनों किताबों के राजनीतिक और व्यावसायिक निहितार्थ हो सकते हैं, मगर मोटे तौर पर देखें, तो इनमें ऐसा कुछ नया नहीं है, जिनके बारे में पहले कहा या लिखा न गया हो। हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय और कांग्रेस पार्टी सत्ता के दो केंद्र होने से इन्कार करते रहे हैं, मगर न तो सरकार और न ही पार्टी यह आम धारणा बदल सकी। दरअसल ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मनमोहन सिंह राजनीतिक तौर पर कभी मजबूती से अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर सके, जिससे मंत्रियों पर भी उनका नियंत्रण नहीं रहा। उन्हें हमेशा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नियुक्त किए प्रधानमंत्री के रूप में ही देखा गया।
पारेख लिखते हैं कि जब उन्होंने जेपीसी के सदस्य धर्मेंद्र प्रधान के द्वारा अपमानित होने के बाद कोयला सचिव के पद से इस्तीफा दिया था, तब मनमोहन सिंह ने उनसे कहा था कि उन्हें भी रोजाना ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है, मगर ऐसे मुद्दे पर इस्तीफा देना राष्ट्रहित में नहीं होगा। सवाल है कि क्या खुद प्रधानमंत्री ने यह स्थिति स्वीकार की? आखिर उन्होंने ऐसी स्थिति क्यों आने दी कि उनके फैसलों को सोनिया और राहुल गांधी अपनी मर्जी से प्रभावित करते रहे?
इसके साथ ही अपने सबसे कठिन चुनाव का सामना कर रही कांग्रेस को भी सोचना चाहिए कि उसकी यह हालत इसलिए हुई, क्योंकि उसका नेतृत्व जिम्मेदारी लेने से बचता रहा है। इससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर आंच आई है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने बारू और पारेख के आरोपों को सिरे से नकारा है, मगर यह पता नहीं कि व्यक्तिगत तौर पर मनमोहन सिंह इसे किस तरह ले रहे हैं। सक्रिय राजनीति से हटने के बाद क्या वह भी किसी किताब के जरिये अपना पक्ष रखेंगे?