प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह बखूबी जानते हैं कि किसी खास जगह, किसी खास समय, किसी खास मंच से कही गई बातों का क्या मतलब होता है। महज दो महीने के भीतर दूसरी बार जम्मू-कश्मीर पहुंचे मोदी ने पाकिस्तान को आतंकवाद को लेकर बतौर प्रधानमंत्री पहली बार कड़ा संदेश दिया है। वरना प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से उन्होंने पाकिस्तान के प्रति न केवल दोस्ताना रुख अपनाया है, बल्कि दोनों देशों के बीच शांति वार्ता को फिर से पटरी पर लाने की पहल भी की है।
हकीकत यह भी है कि एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से सीमा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन की छिटपुट घटनाओं के अलावा कोई बड़ी आतंकी घटना भी नहीं हुई है। इसके बावजूद मोदी ने सीधे-सीधे पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी फौज को छद्म युद्ध बंद करने की चेतावनी दी है और कहा है कि पड़ोसी मुल्क में अपने दम पर युद्ध लड़ने का माद्दा नहीं है।
दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की ताजा पहलों के बीच आखिर इस आक्रामकता की वजह क्या है, वह भी स्वतंत्रता दिवस से ऐन तीन दिन पहले? ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री पड़ोसी मुल्क के साथ ही अपने देशवासियों को भी संदेश देना चाहते हैं कि आतंकवाद के मुद्दे पर उनकी सरकार कोई समझौता नहीं करेगी।
मोदी ने इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में विकास पर भी जोर दिया है। 60 करोड़ रुपये की कर्ज माफी, आठ हजार करोड़ रुपये की सड़क परियोजनाओं की घोषणा, दो पनबिजली परियोजनाओं और लेह-श्रीनगर-करगिल ट्रांसमिशन लाइन का उद्घाटन, राज्य के प्रति मोदी सरकार की प्राथमिकताओं को बताने के लिए काफी है।
हालांकि मोदी की जम्मू-कश्मीर यात्रा का एक अहम पहलू यह भी है कि देश की कमान संभालने के बाद वह दूसरी बार जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर आए तो जरूर, लेकिन अब तक बतौर प्रधानमंत्री वह श्रीनगर के इलाके में नहीं गए हैं। पहली बार उनका दौरा जम्मू क्षेत्र तक सीमित था, और इस बार लेह-लद्दाख और कारगिल तक।
ये ऐसे क्षेत्र हैं, जहां से भाजपा को लोकसभा की तीन सीटें मिली हैं और जहां से विधानसभा की तकरीबन चालीस सीटें आती हैं, जोकि बहुमत से कुछ ही कम है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में मिली व्यापक सफलता के बाद स्वाभाविक रूप से मोदी और भाजपा की नजर इसी वर्ष के अंत में होने वाले जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव पर होगी।