यह पाकिस्तान में ही संभव है कि एक भीषण आतंकवादी हमले के तुरंत बाद जब जेलों में बंद 'बुरे तालिबान' को फांसी देने की तैयारी हो, तब पड़ोसी देश में उससे भी भयावह हमले की साजिश रचने वाले आतंकी सरगना को 'सुबूतों के अभाव में' जमानत दे दी जाए! भारत के तेवर को देखते हुए इस्लामाबाद ने जकीउर रहमान लखवी की जमानत को तकनीकी भूल बताते हुए उसे तीन महीने के लिए नजरबंद तो कर लिया है, उसकी रिहाई के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात भी कही है।
पर जब पिछले छह वर्षों में पाकिस्तान ने लखवी के खिलाफ सुबूत जुटाने में दिलचस्पी ही नहीं दिखाई, तो ऊपरी अदालत में यह मामला कितनी दूर तक जाएगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। साफ है कि यह भारत समेत विश्व समुदाय की आंखों में धूल झोंकने की पाकिस्तान की एक और कोशिश ही है। लखवी पर मुंबई हमलों की योजना बनाने, उसे मूर्त रूप देने और इसके लिए पैसों का इंतजाम करने का आरोप है। खुद अजमल कसाब ने अपनी स्वीकारोक्ति में षड्यंत्रकारी 'चचा लखवी' का जिक्र किया था।
इसके बावजूद पाकिस्तान की आतंकवाद-निरोधक अदालत में इस मुकदमे की सुनवाई न सिर्फ लगातार स्थगित होती ही रही, बल्कि जान के डर से एक जज ने खुद को इससे अलग कर लिया। आखिर मुंबई हमले में पाक आतंकवादियों की लिप्तता के सुबूतों को इस्लामाबाद अब तक नकारता ही रहा है। विडंबना यह है कि पेशावर की बर्बरता के बाद भी आतंकवाद पर पाकिस्तान का दोहरा रवैया नहीं बदल रहा है।
दाऊद इब्राहिम को शरण देने के बावजूद झूठ बोलने और 26/11 को जायज ठहराने वाले एक और आतंकी सरगना हाफिज सईद को छुट्टा घूमने देने के अलावा वह उस लखवी के मामले में नरमी बरत रहा है, जिसे संयुक्त राष्ट्र तक आतंकवादी ठहरा चुका है। ऐसे में, पाकिस्तान का यह आश्वासन काफी नहीं है कि वह लखवी की जमानत के आदेश को चुनौती देगा। बल्कि सवाल यह है कि खुद आतंकवाद से पीड़ित और आतंकियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने का ऐलान करने वाला पाकिस्तान लखवी के साथ क्या सुलूक करने वाला है।