चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा की गहमागहमी के बीच अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई के आज से शुरू हो रहे दौरे की अनदेखी संभव नहीं है, तो इसलिए कि उनका आना भी हमारे पड़ोस में शांति और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
अगले साल जब नाटो सैनिक अफगानिस्तान छोड़ देंगे, तब वहां की सुरक्षा का क्या होगा, यह बड़ा सवाल है। वैसे तो भारत और अफगानिस्तान, दोनों शांति चाहते हैं। युद्धविध्वस्त अफगानिस्तान को पटरी पर लाने के लिए भारत ने वहां बुनियादी क्षेत्र में निवेश तो किया ही है, उसकी सुरक्षा के लिए एक समझौता भी किया है।
लेकिन भारत के चाहने भर से वहां शांति और सुरक्षा मुमकिन नहीं है। यह पाकिस्तान के रवैये पर निर्भर करेगा। लेकिन घटनाएं बताती हैं कि नाटो सैनिकों की वापसी से पहले ही अफगानिस्तान कट्टरता और हिंसा के दलदल में फंसता जा रहा है।
वहां की महिलाओं को ताकतवर बनाने के लिए करजई ने एक कानून को मंजूरी दी थी, जिसके तहत बाल विवाह पर रोक लगाने, दो से अधिक पत्नियां न रखने, औरतों की खरीद-फरोख्त बंद करने और बलात्कार की शिकार महिलाओं के खिलाफ मुकदमा न चलाने जैसे प्रगतिशील फैसले थे।
करजई के बाद इस कानून को कोई चुनौती न दे सके, इसलिए इसे संसद से पारित कराने की कोशिश की गई, लेकिन कट्टरपंथियों के सख्त ऐतराज के कारण यह पारित न हो सका। तालिबान के पतन के करीब एक दशक बाद अफगानिस्तान में कट्टरपंथियों का वर्चस्व खतरनाक तो है ही, पाक-अफगान सीमा पर बढ़ता तनाव भी चिंताजनक है।
पाकिस्तान की ओर से अफगान सैनिकों पर हमले हो रहे हैं। पाक तालिबान के खिलाफ सैनिक सहायता मांगने ही करजई भारत आए हैं। हालांकि पाकिस्तान में नवाज शरीफ का प्रधानमंत्री के रूप में उभरना आश्वस्तकारी है, पर यह मानना भोलापन ही होगा कि उनके आने से आपसी रिश्ते बेहतर हो जाएंगे।
जाहिर है, पाकिस्तान में सरकार का सिर्फ चेहरा बदल रहा है, सैन्य वर्चस्व खत्म होने की गारंटी नहीं है। इसके बावजूद अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए जितना संभव हो, वह तो हमें करना ही चाहिए, इस संदर्भ में पाकिस्तान की नई सरकार के साथ वार्ता भी जरूरी है।