पाकिस्तान में नवाज शरीफ को हटाने के लिए पिछले कुछ समय से चल रहा आंदोलन पहले से ही चिंता का विषय था, अब इसके हिंसक हो जाने से लोकतांत्रिक सरकार की स्थिरता पर असर पड़ने की आशंका गहराने लगी है। शनिवार की रात संसद परिसर में प्रवेश करते आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच हुई भिड़ंत में, जो रविवार को भी कमोबेश जारी रही, कुछ मौतें हुई हैं, तो सैकड़ों लोग घायल हुए हैं।
मौजूदा गतिरोध में पहले सेना ने अपेक्षाकृत संतुलित रवैये का परिचय दिया था, पर बाद में उसकी मध्यस्थता पर पैदा हुए विवाद और बिगड़े हालात को देखते हुए कॉर्प्स कमांडरों की बैठक बुलाने के सेनाध्यक्ष के ताजा फैसले के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। इसमें शक नहीं कि चुनावी जीत के जोश में अपने विरोधियों की अनदेखी करने की गलती प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी की। नहीं तो शुरुआत में कुछेक सीटों पर दोबारा मतगणना की मांग करने वाले इमरान खान आज पीएमएल (नवाज) की चुनावी जीत को ही धांधली का नाम नहीं देते।
इसी तरह मौलाना ताहिरुल कादरी की मांगों के प्रति शुरुआत में ही नरमी दिखाने पर शायद यह स्थिति न आती। अलबत्ता पाकिस्तान को हिंसा, गतिरोध और अनिश्चय के इस तिराहे तक पहुंचाने के लिए ताहिरुल कादरी और इमरान खान कहीं ज्यादा जिम्मेदार हैं।
ताहिरुल कादरी चूंकि एक धर्मगुरु हैं, लिहाजा पाकिस्तान जैसे एक कट्टरवादी मुल्क में उनके आंदोलन और उनके समर्थकों की भीड़ से उतना आश्चर्य नहीं होता। पर इमरान खान जैसे राजनेता एक चुनी हुई सरकार को सत्ता से बाहर करने की जैसी कोशिशों में लगे हैं, वे हैरान भी करती हैं और क्षुब्ध भी। तब तो और भी, जब इस आंदोलन में खुद उनकी चमक भी फीकी हुई है।
आंदोलनकारियों की जितनी बड़ी भीड़ की वह उम्मीद कर रहे थे, उतने लोग नहीं जुटे। इसकी वजह यह है कि पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी लोकतांत्रिक सरकार को अस्थिर होते नहीं देखना चाहती, क्योंकि वैसे में सैन्य तानाशाही की आशंका प्रबल हो जाएगी। यहां तक कि इमरान खान के तौर-तरीके से खुद उनकी पार्टी के अनेक लोग सहमत नहीं हैं, इसके बावजूद वह नवाज शरीफ को हटाने की एक ऐसी मुहिम में लगे हैं, जिससे पाकिस्तान का लोकतंत्र ही अस्थिर होगा। पड़ोस का घटनाक्रम, खुद हमारे लिए भी बेहद चिंतनीय और चौकन्ना रहने का अवसर होना चाहिए।