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अलविदा जोहरा आपा

Fri, 11 Jul 2014 08:02 PM IST
नई दिल्ली
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कुछ बरस पहले एक साक्षात्कार में जोहरा सहगल ने कहा था कि जिंदगी बेहद कठोर है, लेकिन मैं उससे भी कठोर हूं और मैंने जिंदगी को उसी के खेल में पछाड़ दिया है! निश्चय ही उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि काफी समृद्ध थी, लेकिन पिछली सदी के शुरुआती दशकों में जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना मुश्किल था, उन्होंने लीक तोड़कर अपने लिए अलग राह बनाई।
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नृत्यांगना के रूप में करियर की शुरुआत करने वाली जोहरा सहगल ने रंगमंच से लेकर सिनेमा और टीवी तक में सात दशक से भी लंबे करियर में जिस सक्रियता से काम किया, वैसी मिसालें कम ही मिलती हैं। कहां तो 1935 में उन्होंने उदय शंकर के बैले ग्रुप में नृत्यांगना के बतौर करियर शुरू किया था और अभी सात वर्ष पहले 2007 में यानी 72 वर्ष बाद -जब वह खुद 95 वर्ष को हो चुकी थीं- तक वह चीनी कम और सांवरिया जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाओं में नजर आईं।

नई पीढ़ी को शायद यह पता ही न हो कि उन्होंने राजकपूर की आवारा और गुरुदत्त की बाजी जैसी चर्चित फिल्मों के लिए कोरियोग्राफी भी की थी। उनका रंग-रूप अनाकर्षक होने की हद तक साधारण था, जिसे लेकर वह खुद पर भी फब्ती कसने से गुरेज नहीं करती थीं, मगर अपनी चमकदार आंखों और चेहरों के हावभाव से वह अपने किरदार को बेहद सशक्त बना देती थीं।
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एक बार उन्होंने कहा था कि अगर खराब भूमिका मिले, तो मैं उसे संवारकर अच्छा बना देती हूं! संभवतः इसके पीछे रंगमंच की उनकी पृष्ठभूमि थी, जिसमें उन्होंने अच्छा खासा वक्त गुजारा। वास्तव में 1945 में पृथ्वी थियेटर से जुड़ने के समय वह और उनकी बहन उजरा बट थियेटर की सबसे महंगी कलाकारों में से थीं।

उनके साथ काम कर चुके लोग कहते हैं कि उन्हें कभी निराश या दुविधा में नहीं देखा गया। जबकि उनके जीवन का एक पक्ष यह भी है कि अपने से आठ वर्ष छोटे पति की असमय मौत से भी उन्हें गुजरना पड़ा था। और तब वह टूटी नहीं, बल्कि अपने बच्चों को लेकर हालात से लड़ती रहीं और इसी दौर में एक स्कॉलरशिप के सिलसिले में लंदन चली गईं और वहां पहले टीवी और उसके बाद अंग्रेजी फिल्मों में काम किया।
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जीते जी किवदंती बन चुकीं जोहरा सहगल चाहती थीं कि जब कभी मौत आए, तो उनके चेहरे पर मुस्कराहट बनी रही। वाकई ऐसा वही कह सकती थीं।
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