संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुई जी-4 की बैठक के बाद एक पखवाड़े से भी कम समय के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की फिर से मुलाकात के दोनों देशों के रिश्तों के लिए तो मायने हैं ही, इसे वैश्विक और क्षेत्रीय समीकरणों के लिहाज से भी अहम कहा जा सकता है।
यूरोप की सबसे ताकतवर और विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी और एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार की अपार संभावनाएं हैं, जिसकी झलक मर्केल के भारत प्रवास के दौरान हुए समझौतों में देखी जा सकती है। जिन आठ एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं, उनमें सौर ऊर्जा के क्षेत्र में साझेदारी, नागरिक उड्डयन, खाद्य सुरक्षा, रक्षा और विनिर्माण क्षेत्र में सहयोग के साथ ही जर्मनी कंपनियों के लिए फास्ट ट्रैक सिस्टम लागू करने से संबंधित समझौते भी शामिल हैं।
वास्तव में जर्मनी को जहां भारत से आईटी कौशल की दरकार है, वहीं बदले में हमें उससे प्रौद्योगिकी मिल सकती है, जिससे विनिर्माण क्षेत्र में नई हलचल पैदा हो सकती है। यह दोतरफा रिश्ता है। जहां तक ऊर्जा क्षेत्र की बात है, तो हमें यह पता होना चाहिए कि जर्मनी ने जापान के फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में हुए हादसे के बाद अपने सभी परमाणु बिजली घर बंद करने का फैसला कर लिया था।
जाहिर है, वह जीवाश्म और बायो ईंधन तथा सौर ऊर्जा जैसे स्रोतों के जरिये अपनी जरूरतें पूरी करेगा। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से भी जर्मनी से दोस्ती उपयोगी साबित हो सकती है। मर्केल के साथ आए औद्योगिक प्रतिनिधिमंडल के भीतर यदि यह राय है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद भारत में निवेश का अपेक्षित माहौल नहीं है, तो इस पर विचार करने की भी जरूरत है।
यदि निवेशकों को अब भी लाइसेंस परमिट राज की तरह मंजूरी के लिए भटकना पड़े, तो इसका असर प्रधानमंत्री की मेक इन इंडिया जैसी योजना पर पड़ना लाजिमी है। जर्मनी के साथ हुए फास्ट ट्रैक सिस्टम संबंधी समझौते से स्थितियां सुधरने की उम्मीद की जा सकती है। निवेश के लिए माहौल सिर्फ लालफीताशाही को खत्म करने से नहीं बनेगा, बल्कि इसके लिए कर प्रणाली में सुधार करने की भी जरूरत है।