खाद्य सुरक्षा कानून को संसद में पारित करवाने के बजाय संप्रग सरकार ने जिस तरह अध्यादेश का रास्ता चुना है, उससे उसकी राजनीतिक मंशा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसके बावजूद यह देश की दो तिहाई आबादी को खाद्य सुरक्षा के दायरे में लाने वाला एक बड़ा कदम है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
असल में, बीते कई वर्षों से खाद्य सुरक्षा एक बड़ा सवाल बनकर उभरी है। छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे अनेक राज्यों ने इस दिशा में कदम भी उठाए हैं, जिनके बेहतर नतीजे सामने आए हैं और सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक लाभ भी मिला है। मसलन, छत्तीसगढ़ विधानसभा का पिछला चुनाव रमन सिंह ने 'चावल वाले बाबा' के नाम पर ही जीत लिया था!
यदि संप्रग की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं, तो इसलिए क्योंकि उसे नौ वर्षों तक इसकी सुध नहीं आई और अब उसे इतनी बेताबी हो गई कि उसने महीने भर बाद शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र का भी इंतजार नहीं किया। यह वाकई त्रासद है कि आजादी के छह दशकों के बाद भी करोड़ों लोगों को भूख से जद्दोजहद करनी पड़ रही है, मगर सुखद है कि इस अध्यादेश से उन्हें खाद्य सुरक्षा का वैधानिक अधिकार मिल जाएगा।
निश्चित रूप से यह एक महंगी योजना है, क्योंकि इसकी वजह से सरकारी खजाने पर सवा लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे कुपोषण से लड़ने में मदद मिलेगी, वरना अभी यह स्थिति है कि देश के 45 फीसदी बच्चे इससे जूझ रहे हैं। हालांकि अध्यादेश के लागू होने के बावजूद इस पर अमल होने में छह से नौ महीने का वक्त लग सकता है।
इसके अलावा एक बड़ी चुनौती सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मुस्तैद करने की भी है, क्योंकि उसका अब तक का रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा है। सवाल है कि क्या सस्ता अनाज सही लाभार्थियों तक पहुंच पाएगा? एक आशंका यह भी है कि इसकी वजह से केंद्र और उन राज्यों के बीच टकराव तो नहीं पैदा हो जाएगा, जहां पहले से ही इस तरह की योजना काम कर रही है।
हालांकि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव खाद्य सुरक्षा कानून को किसान विरोधी बता रहे हैं, इसके पीछे उनकी राजनीति हो सकती है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि यह पूरी योजना खाद्यान्न उत्पादन पर ही टिकी होगी। एक अच्छी नीति के लिए जरूरी है कि नीयत भी साफ हो।