पिछले कुछ दशकों से विवादास्पद रहे योजना आयोग की विदाई अप्रत्याशित नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से इसे भंग करने और इसकी जगह कहीं अधिक समायोजक संस्था बनाने का ऐलान किया था। हकीकत यह है कि मार्च, 1950 में गठित योजना आयोग ने शुरुआती दशकों में निश्चय ही आधारभूत संरचना और आर्थिक विकास के मद्देनजर बेहतर काम किया, पर कालांतर में वह अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था।
खासतौर से 1991 में नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद योजना आयोग पर सवाल उठने लगे थे। संभवतः इसकी बड़ी वजह यह भी रही कि योजना आयोग राज्यों पर एक समानांतर केंद्रीय सत्ता की तरह नियंत्रण कर रहा था और उनकी नीतियों और योजनाओं को प्रभावित कर रहा था। भारत के संघीय ढांचे में राज्यों की प्रमुख भूमिका होती है, मगर हालत यह थी कि निर्वाचित मुख्यमंत्रियों तक को अपने राज्यों के हितों के लिए योजना आयोग के समक्ष याचक बनना पड़ता था।
बेशक, योजना आयोग ने 12 पंचवर्षीय योजनाएं दीं, पर समय के साथ इसके तौर-तरीके में बदलाव नहीं किया गया। बल्कि होता यह था कि उसकी बैठकें केंद्र और राज्य तथा राज्यों के बीच के आपसी टकराव का सबब बनती गईं। इसके अलावा गरीबी की अपनी परिभाषा के कारण भी पता चला कि योजना आयोग जमीनी यथार्थ से कितना दूर हो गया है। इस आयोग की जगह गठित किए जा रहे नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया यानी 'नीति' आयोग का दायरा काफी व्यापक बनाया गया है, और उसमें मुख्यमंत्रियों को भी शामिल किया जा रहा है।
नीति आयोग को सरकार का 'थिंक टैंक' बताया जा रहा है, जो केंद्र और राज्य के स्तर पर सरकारों को रणनीतिक और तकनीकी सलाह देगा और नीति निर्धारण में मदद करेगा। इस तरह का बदलाव नया नहीं है। चीन ने अपने स्टेट प्लानिंग कमीशन को बदलकर नेशनल डेवलपमेंट ऐंड रिफॉर्म्स कमीशन का रूप दिया था। मगर इसके साथ ही यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि नेहरूवादी समाजवादी मॉडल को बदलने की यह कवायद सिर्फ विचारधाराओं की प्रतीकात्मक लड़ाई में न उलझकर सिमट जाए। इस पर भी गौर करने की जरूरत है कि यह कवायद निवेशकों के हितों की पोषक बनकर भी न रह जाए, बल्कि सही अर्थों में परिवर्तन की वाहक बने।