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उनकी सुरक्षा की कीमत

Fri, 15 Feb 2013 09:18 PM IST
नई दिल्ली
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हमारी साझा स्मृतियों में 16 दिसंबर की रात दिल्ली के संभ्रात कहे जाने वाले इलाके में 23 वर्षीय युवती के साथ हुई बलात्कार की जघन्य घटना जस की तस बनी हुई है और इसके बाद ही आम आदमी की सुरक्षा को लेकर बहस तेज हुई है। निश्चय ही, सवा अरब की आबादी को सुरक्षा मुहैया कराना एक बड़ी चुनौती है, मगर देश का पुलिस अमला और अन्य सुरक्षा बल जिस तरह से अति विशिष्ट और विशिष्ट जन की सेवा में जुटे हुए हैं, उससे हैरत होती है।
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यों तो अक्सर लोकतांत्रिक मूल्यों और समता के अधिकारों की दुहाई दी जाती है, लेकिन आम आदमी की सुरक्षा को लेकर सरकारों के रवैये में कोई अंतर नहीं दिखता। लाल बत्ती और विशेष सुरक्षा घेरे का भय दिखाकर रौब गांठने की घटनाएं अपने आसपास कहीं भी देखी जा सकती हैं। इसी का नतीजा है कि एक बार फिर सर्वोच्च अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को आम आदमी की सुरक्षा का एहसास कराया है और जानना चाहा है कि आखिर अति विशिष्ट लोगों की सुरक्षा पर कितना खर्च किया जा रहा है और इसका आधार क्या है, और वे कौन लोग हैं, जिन्हें यह सुविधा मुहैया कराई जा रही है।

इसके साथ ही अदालत ने यह भी पूछा है कि जिन लोगों को सुरक्षा मुहैया कराई जा रही है, उनमें ऐसे कितने लोग हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि सर्वोच्च अदालत के इन निर्देशों से ही परिदृश्य स्पष्ट हो जाता है। गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले पुलिस अनुसंधान और विकास ब्योरे के आंकड़ों के मुताबिक देश में 761 लोगों के पीछे एक पुलिसकर्मी है, जबकि एक विशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा में तीन पुलिसकर्मी तैनात हैं!
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इस आंकड़े को दूसरी तरह से देखें, तो देश की करीब एक लाख की आबादी की सुरक्षा के लिए औसतन 125 पुलिसकर्मी हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र के मानदंडों के मुताबिक इतनी आबादी के लिए 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए। बात सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं, दूसरे नागरिक अधिकारों की भी है, क्योंकि इसी सुरक्षा के नाम पर उन सड़कों पर आम लोगों की आवाजाही रोक दी जाती है, जहां से मंत्रियों या आला अधिकारी को गुजरना होता है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने ठीक कहा है कि इस समस्या ने महामारी का रूप ले लिया है और यह राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन गई है। राजनीतिक वर्ग को समझना चाहिए कि उसके प्रति लोगों के घटते विश्वास की एक वजह यह भी है।
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