जयललिता ने शनिवार को पांचवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है, तो वह एक रिकॉर्ड की दृष्टि से उल्लेखनीय भले हो, लेकिन इसे लोकतंत्र की जीत नहीं मान सकते। अभी वह चुनाव जीतकर नहीं आई हैं, बल्कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी किया है, और इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाने की गुंजाइश फिलहाल बनी हुई है।
अगर जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का यह मामला खत्म हो जाता है, तब भी एक दंभी, चापलूस पसंद और भ्रष्ट राजनेता के तौर पर उनकी छवि बनी रहेगी। उनकी सनक, ठाठ-बाट और अपने नजदीकियों को फायदा पहुंचाने के अनेक किस्से हैं। यह दूसरी बार है, जब अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। और यह कौन नहीं जानता कि कुर्सी छोड़ने के बाद वह पन्नीरसेलवम को बतौर 'खड़ाऊं मुख्यमंत्री' रख छोड़ती हैं!
मगर भ्रष्टाचार के मुकदमे में बरी होने के बाद भी जयललिता के शपथ ग्रहण समारोह में तय मान्यताओं की जिस तरह धज्जियां उड़ाई गईं, वे स्तब्ध करने वाली हैं। अव्वल तो समारोह में जयललिता ने अंधविश्वास का जिस तरह खुला प्रदर्शन किया, और यह पहली बार नहीं था, वही बहुत खटकने वाला था। एक राज्य की मुखिया सार्वजनिक तौर पर अपने अंधविश्वासी होने का परिचय देती हैं, तो इससे अच्छा संदेश नहीं जाता। तब तो और नहीं, जब आपसे संविधान का पालन करने की उम्मीद की जाती है। सारा कार्यक्रम जल्दी निपटाने के लिए मंत्रियों को समूह में शपथ दिलाई गई। यह भले गलत न हो, लेकिन शुभ मुहूर्त का ध्यान रखते हुए बावन सेकंड के राष्ट्रगान को जिस तरह बीस सेकंड में खत्म कर दिया गया, वह तो मान्य नियमों की अवमानना थी।
गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों के मुताबिक, राज्यपाल के आगमन और प्रस्थान के समय राष्ट्रगान पूरा बजाने का प्रावधान है। पर शपथ ग्रहण समारोह में पहली बार राष्ट्रगान की सिर्फ दो पंक्तियां बजीं, फिर तमिलनाडु का राज्यगान बजा, और आखिर में राष्ट्रगान पूरा बजा। जाहिर है, पहली बार राष्ट्रगान की अमर्यादा हुई। पर इसकी निंदा करना तो दूर, जयललिता के शपथ लेने पर बधाइयां दी गईं। राजनीति में मजबूरियां इतनी भी क्यों होनी चाहिए कि राष्ट्रगान की अमर्यादा की आलोचना तक न की जा सके?