वैसे तो जुलाई की शुरुआत में मोहम्मद मुर्सी को अपदस्थ कर देने के बाद से ही मिस्र सुलग रहा था, लेकिन तब भी वहां की सेना से ऐसी बर्बरता की किसी ने कल्पना नहीं की थी। सिर्फ यही नहीं कि हिंसा की तस्वीरें सैन्यकर्मियों की चरम अमानवीयता की कहानी कहती हैं, बल्कि करीब साढ़े छह सौ तक पहुंच गया मृतकों का आंकड़ा हिंसा की भयावहता बताने के लिए भी काफी है।
इस सुनियोजित बर्बरता के दौरान सेना को रोकने की कोई कोशिश नहीं की गई। यह ठीक है कि लोकतांत्रिक सरकार के प्रमुख के तौर पर मुर्सी कोई छाप नहीं छोड़ सके थे। स्वतंत्र संस्थाओं को एक-एक कर खत्म कर और सारी शक्ति मुस्लिम ब्रदरहुड के हाथों में केंद्रित करके उन्होंने साफ कर दिया था कि सैन्य तंत्र के शासन वाले मिस्र में अब कट्टरपंथियों की चलेगी। इसके बावजूद मुर्सी को फिर से सत्ता सौंपने की मांग के साथ पिछले कई सप्ताह से धरने पर बैठे उनके समर्थकों के साथ ऐसी बर्बरता का कोई औचित्य नहीं था। लेकिन सैन्य समर्थित सरकार ने शुरू में इस नरसंहार के लिए क्षोभ जताना तक जरूरी नहीं समझा। अब वह दलील दे रही है कि मुल्क को आतंकवादियों से खतरा है।
इस मामले में सबसे आपत्तिजनक रवैया तो अमेरिका का है। राष्ट्रपति ओबामा ने दिखावे के तौर पर इस हिंसा की निंदा की और विरोधस्वरूप हर दो साल में होने वाले अमेरिका-मिस्र संयुक्त सैन्याभ्यास को रद्द करने की घोषणा की, जबकि 2011 में भी हिंसा के कारण संयुक्त सैन्याभ्यास नहीं हुआ था। अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने नरसंहार पर चुप्पी साधकर जल्दी चुनाव की मांग करते हुए पूरी तरह साफ कर दिया है कि महाशक्ति देश मिस्र की सेना के साथ है!
गौरतलब है कि अमेरिका ने मुर्सी को अपदस्थ करने की घटना को तख्तापलट नहीं माना था और न ही उसने मिस्र की सेना को दी जा रही सालाना 1.3 अरब डॉलर की मदद रोकने का कोई संदेश दिया है, जबकि डेनमार्क जैसे मुल्कों ने इस हिंसा के तत्काल बाद मदद रोकने की घोषणा की है। अब जब अमेरिका मिस्र की सेना की इस बर्बरता पर चुप है, तो संयुक्त राष्ट्र से सख्ती की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है!
यह तो विडंबना है ही कि मिस्र में आसमान से गिरने के बाद खजूर में अटकने जैसे हालात बन गए हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा दुखद यह है कि दुनिया के ताकतवर और प्रभावशाली देश भी मिस्र के इस घटनाक्रम की तरफ उदासीन हैं।