अशक्त लोगों की मदद से जुड़े केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद की अगुआई वाले ट्रस्ट पर वित्तीय अनियमितता और फरजी दस्तावेजों के आरोप लगने भर से उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मगर पूर्व राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन के नाम से बने ट्रस्ट के कामकाज को लेकर जो बातें सामने आई हैं, वे संदेह पैदा करती हैं।
खुद सलमान खुर्शीद ने भी माना है कि ट्रस्ट के द्वारा आयोजित होने वाले शिविरों और केंद्र सरकार से अनुदान लेने के क्रम में हुई लिखा-पढ़ी के दौरान दस्तावेजों में से कुछ में अधिकारियों के फरजी दस्तख्त पाए गए हैं। सवाल है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आ गई कि अशक्त लोगों की सेवा से जुड़े इस ट्रस्ट को फरजी दस्तख्त का सहारा लेना पड़ा! और जिन लोगों के फरजी हस्ताक्षर की बात सामने आई हैं, उनमें तो एक सेवानिवृत्त अधिकारी भी शामिल है।
बेशक सलमान खुर्शीद की व्यक्तिगत ईमानदारी संदेह से परे रही है, और उनका ट्रस्ट ऐसे लोगों की सेवा से जुड़ा हुआ है, जिन्हें समाज अकसर हाशिये पर डाल देता है। यदि ऐसे लोगों के साथ ही छलावा किया जाए, तो क्या उनकी आड़ में सरकारी धन का दुरुपयोग करने वाले ट्रस्ट की निष्पक्ष जांच नहीं होनी चाहिए? इससे सार्वजनिक जीवन की शुचिता, पारदर्शिता और नैतिकता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
यह मामला सिर्फ सलमान खुर्शीद तक सीमित नहीं है, इससे यूपीए सरकार की साख भी जुड़ी है, जिसकी विश्वसनीयता गिरती जा रही है। पखवाड़े भर नहीं हुए, जब रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ की ओर से की गई मेहरबानी का मामला सामने आया था और तब खुर्शीद सहित अनके वरिष्ठ मंत्री उनके बचाव में खड़े हो गए थे। अब तकरीबन वैसे ही तर्कों के साथ कांग्रेस और सरकार खुर्शीद के साथ खड़ी है। इन दोनों प्रकरणों ने भारतीय राजनीति और समाज में चौबीस घंटे चौकस रहने वाले मीडिया के बढ़ते असर को भी रेखांकित किया है।
बेशक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी मीडिया की इस भूमिका को बखूबी समझते हैं। मगर उन्हें सिर्फ यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि यह उनका भावी राजनीतिक दल के प्रचार का हथकंडा है। वाकई राजनीति अब बदल रही है, राजनीतिकों को सिर्फ संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता।