भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह एक ऐसा दौर है, जब अनुकूल वैश्विक परिस्थितियों के साथ सरकार की सक्रियता से भी उम्मीद का माहौल बनने लगा है। विश्व बाजार में कच्चे तेल के भाव में गिरावट जारी रहने से महंगाई दर में निरंतर कमी आ रही है; अधिकांश खाद्य पदार्थों के दामों में भी नरमी का रुख है।
आंकड़ों में घटती महंगाई वास्तविक धरातल पर हालांकि अब भी उतनी कम नहीं हुई है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से मुद्रास्फीति का दबाव जिस तरह कम हुआ है, वह जरूर रेखांकित करने लायक है। इतना ही नहीं, औद्योगिक उत्पादन में हताशा की स्थिति भी अब खत्म होती दिखाई देती है। विगत सितंबर में औद्योगिक उत्पादन बढ़ा है। साफ है कि औद्योगिक मोर्चे पर गतिरोध तोड़ने के सरकारी प्रयास सफल हो रहे हैं। यानी कम होती महंगाई, सुधरते औद्योगिक उत्पादन और शेयर बाजार में मजबूती से अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के मजबूत संकेत दिखाई देने लगे हैं।
खासकर शेयर बाजार में आई मजबूती तो वैश्विक मानचित्र में भारत को एक बेहतर निवेश केंद्र के रूप में फिर से स्थापित करने का सुबूत भी है। तेल मूल्य में गिरावट से रूस को नुकसान हो रहा है, जबकि ब्राजील की आंतरिक चुनौतियों का असर वहां की अर्थव्यवस्था पर दिखता है। लेकिन कच्चे तेल की कीमत में कमी का भारत को कई मोर्चों पर सीधा लाभ मिल रहा है। एनडीए सरकार की छवि के कारण भी हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर भारत को बेहतर आर्थिक संभावनाओं वाले देश के रूप में आंका जाने लगा है।
डीजल-पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क बढ़ने से शेयर बाजार हालांकि तात्कालिक रूप से थोड़ा लुढ़का है, पर यह बहुत चिंतित करने वाली बात इसलिए नहीं है, क्योंकि यह मूल्यवृद्धि राजस्व में बढ़ोतरी के लिए की गई है, जो अंततः सरकार की सेहत को ही फायदा पहुंचाएगी, और कच्चे तेल में तेजी की आशंका फिलहाल है नहीं। कृषि, विनिर्माण और रोजगार के मोर्चे पर यद्यपि अब भी सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं। पर वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां इसी तरह अनुकूल बनी रहीं और सरकार भी मितव्ययिता के मंत्र के साथ औद्योगिक जड़ता तोड़ने में सक्रियता दिखाए, तो तस्वीर और अच्छी हो सकती है। देखने लायक बात अलबत्ता अब यह है कि आने वाले दिनों में रिजर्व बैंक ब्याज दर घटाने का बहुप्रतीक्षित कदम उठाता है या नहीं।