कमजोर मानसून की भविष्यवाणी का असर भले ही शेयर बाजार में दिख रहा हो, लेकिन विश्व बैंक ने भारत की अर्थव्यवस्था पर न केवल भरोसा जताया है, बल्कि उसका आकलन है कि इस वर्ष उसकी आर्थिक रफ्तार चीन को पीछे छोड़ देगी। इससे पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और एकाधिक रेटिंग एजेंसी भी इस तरह का आकलन जारी कर चुकी है। विश्व बैंक का आकलन है कि इस वर्ष भारत की जीडीपी 7.5 फीसदी की दर से मजबूत होगी, वहीं चीन की जीडीपी वृद्धि दर के 7.1 फीसदी रहने का अनुमान है।
हालांकि ये शुरुआती अनुमान हैं, पर विश्व बैंक ने रेखांकित किया है कि उसके ग्रोथ चार्ट में पहली बार भारत सबसे ऊपर है और अगले दो वर्ष में इसकी विकास दर आठ फीसदी को छू सकती है। अमेरिका, यूरो जोन और जापान की अर्थव्यवस्था में स्थिरता आने के बाद से वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया की ओर स्थानांतरित हो चुका है, जहां चीन और भारत की आर्थिक रफ्तार में होड़ की बातें पहले से हो रही हैं। बावजूद इसके कि आबादी के लिहाज से ये दोनों देश पहले और दूसरे नंबर पर हैं, उनकी अर्थव्यवस्था में काफी असमानताएं हैं। मसलन, चीन को दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब माना जाता है, वहीं इस क्षेत्र में मेक इन इंडिया जैसी महत्वाकांक्षी योजना के बावजूद भारत में अब तक अपेक्षित तेजी नहीं आ सकी है।
इसके अलावा सच यह भी है कि चीन में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया 1978-80 के आसपास शुरू हो चुकी है, जबकि भारत में न केवल यह प्रक्रिया देर से शुरू हुई, बल्कि राजनीतिक कारणों ने उसे बाधित भी किया। इसमें संदेह नहीं कि अर्थव्यवस्था की मजबूती प्रधानमंत्री मोदी की प्राथमिकता में है और विगत एक वर्ष में आर्थिक सुधारों की दिशा में काम भी हुआ है। मसलन, कोयला खदानों और 2 जी स्पेक्ट्रम की नए सिरे से हुई नीलामी से निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। विश्व बैंक के आकलन पर गौर करते हुए यह ध्यान रखने की भी जरूरत है कि आर्थिक विकास एकतरफा नहीं हो सकता, जैसा कि भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को लेकर देखा जा सकता है, जिसे संसद से पारित करवाना मोदी सरकार के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती है।