चंद्रयान और मंगलयान के बाद जीएसएलवी मार्क-3 का सफल परीक्षण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इसरो, की तकनीकी दक्षता का नवीनतम उदाहरण तो है ही, इसकी दोहरी उपलिब्धयां भी उतनी ही ध्यान देने लायक हैं। यह अंतरिक्ष यान या रॉकेट इनसैट-4 जैसे चार-पांच टन के भारी-भरकम उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम है। जबकि अब तक हम अधिक से अधिक दो टन के उपग्रहों को ही अंतरिक्ष में ले जा सकते थे। यानी अब हमें वजनी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने के लिए विदेशी रॉकेटों की जरूरत नहीं पड़ेगी।
आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ इससे अंतरिक्ष अभियानों में इसरो का खर्च भी कम होगा। वैसे तो हमारे अंतरिक्ष यान विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने का काम पिछले काफी समय से करते ही आ रहे हैं, लेकिन यह नया रॉकेट इनसैट-4 श्रेणी के विदेशी उपग्रहों को भी अंतरिक्ष में ले जाने का काम करेगा। जाहिर है कि जीएसएलवी मार्क-3 के प्रक्षेपण के बाद अरबों डॉलर के वैश्विक बाजार में भारत की पकड़ थोड़ी और मजबूत हो गई है। इतना ही नहीं, इस प्रक्षेपण के बाद इसरो मानव अंतरिक्ष अभियान की संभावना के भी करीब पहुंच गया है।
दरअसल यह रॉकेट अपने साथ एक क्रू मॉड्यूल भी ले गया था, जिसे उसने सफलता के साथ वापस पृथ्वी पर छोड़ दिया। हालांकि अंतरिक्ष में मनुष्य को ले जाने में इसरो को अब भी कम से कम एक-डेढ़ दशक तो लगेंगे ही, लेकिन इस मॉड्यूल की सही-सलामत पृथ्वी पर वापसी से यह साबित हो गया है कि भविष्य के हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिक इसके जरिये अंतरिक्ष की यात्रा कर सकते हैं। इससे निकट भविष्य में हमारे यहां अंतरिक्ष विज्ञान करियर के तौर पर तो लोकप्रिय होगा ही, इस क्षेत्र में शोध और अनुसंधान का दायरा भी बढ़ेगा। इसरो इसी तरह आगे बढ़ता रहा, तो निकट भविष्य में रूस, अमेरिका और चीन के बाद भारत चौथा देश होगा, जो अपने बूते अपने नागरिकों को अंतरिक्ष में भेजेगा।
देखने वाली बात यह है कि मंगलयान की तरह यह रॉकेट भी बहुत कम खर्च में, इस तरह के अंतरराष्ट्रीय रॉकेट की लागत के लगभग आधे में, तैयार हुआ है। यानी भारत अंतरिक्ष अभियानों में लगातार आगे तो बढ़ ही रहा है, उसकी बड़ी उपलब्धियां बहुत सस्ते में संभव हो रही हैं। जाहिर है, यह कोई छोटी बात नहीं है।