लोकसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक पराजय के बाद कांग्रेस के भीतर उथल-पुथल स्वाभाविक है, लेकिन पार्टी किसी बड़े बदलाव के लिए तैयार नहीं दिखती। इसके उलट जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के बयानों के बाद कांग्रेस के युवा सचिवों की फौज राहुल गांधी के बचाव में उतर आई है।
असल में चुनाव के तुरंत बाद से ही पार्टी में राहुल और सोनिया के नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पंजाब में पार्टी के एक नेता ने तो इन दोनों को दो साल की छुट्टी लेने तक की सलाह दे डाली थी! चुनाव में पार्टी को मिली हार के लिए यूपीए सरकार का प्रदर्शन तो जिम्मेदार था ही, राहुल गांधी के नेतृत्व की नाकामी भी इससे उजागर हुई। इसके बावजूद पार्टी के भीतर इस पर लोकतांत्रिक तरीके से चर्चा करने की जरूरत तक नहीं समझी गई।
वरिष्ठ नेताओं के बयानों और राहुल के पक्ष में उतरी युवा ब्रिगेड को देखकर ऐसा जरूर लग सकता है कि पार्टी के भीतर बुजुर्ग बनाम युवा पीढ़ी की लड़ाई छिड़ गई है। मगर कांग्रेस का मामला भाजपा से बिल्कुल अलग है, जहां पार्टी में नरेंद्र मोदी युग की शुरुआत के साथ ही बुजुर्ग नेताओं को मार्गदर्शक की भूमिका तक सीमित करने का साहसिक फैसला लेने में गुरेज नहीं किया गया।
कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह राहुल और सोनिया से आगे सोच नहीं पाती और फिर इन दोनों नेताओं की सलाहकार मंडली में बुजुर्ग नेताओं की कमी नहीं है। दरअसल द्विवेदी ने कांग्रेस में बुजुर्ग नेताओं की सेवानिवृत्ति का जो मुद्दा छेड़ा है, उसके निशाने पर ऐसे ही नेता हैं। इसे समझने के लिए एक ही नाम काफी होगा और वह हैं सत्तर वर्ष के मधुसुदून मिस्त्री, जिन्हें राहुल का करीबी माना जाता है।
इसके अलावा यह भी समझने की जरूरत है कि भाजपा और कांग्रेस के तौर-तरीकों में जमीन-आसमान का फर्क है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को पहली बार अपने दम पर सत्ता में आई भाजपा से यह जरूर सीखना चाहिए कि किस तरह उसने कड़े फैसले लेने में गुरेज नहीं किया है। यह वाकई कांग्रेस के लिए चिंता की बात होनी चाहिए कि ऐसे समय, जब हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने हैं, वह दिशाहीन नजर आ रही है। इससे उबरने के लिए संगठन में व्यापक बदलाव की जरूरत है, लेकिन उससे पहले राहुल को अपनी प्रेरणाहीन और अनमने नेता की छवि से उबरना होगा।