उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को विवादरहित बनाने के लिए लाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक का लोकसभा में दो तिहाई बहुमत से पारित होना बताता है कि तमाम राजनीतिक दल जजों की नियुक्ति की मौजूदा प्रणाली में बदलाव चाहते हैं। चूंकि यूपीए की पिछली सरकार ही न्यायिक नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली को बदलने के लिए विधेयक लेकर आई थी, लिहाजा उसकी कमोबेश आपत्तियों के बावजूद इस विधेयक का कानून का रूप लेना तय है।
उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों में नियुक्ति की जो व्यवस्था अभी अस्तित्व में है, उसके खिलाफ खुद न्यायिक क्षेत्र से आवाज उठती रही है। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू का हालिया खुलासा तो इस दिशा में एक उदाहरण भर है। एक तर्क यह भी दिया जाता रहा है कि न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था दुनिया में कम ही है। इसीलिए एनडीए सरकार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक लेकर आई है, जिसके छह सदस्यों में सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश और दो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों के अतिरिक्त केंद्रीय कानून मंत्री तथा दो जानी-मानी हस्तियां होंगी, जिनका चयन न्यायपालिका, प्रधानमंत्री और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता मिलकर करेंगे।
न्यायिक नियुक्तियों में बदलाव लाने वाले इस विधेयक से राजनीतिक पार्टियों को संभवतः ऐसा लग रहा है कि इस कदम से न्यायपालिका की कथित अतिसक्रियता पर अंकुश लग सकेगा। खुद एनडीए इस मामले में इतना उत्साहित है कि आयोग को सांविधानिक दर्जा देने के लिए उसने संविधान संशोधन विधेयक भी पेश किया है, ताकि इसके स्वरूप या कामकाज में कोई उलटफेर आसान न हो। सवाल यह है कि इस विधेयक में न्यायपालिका की गरिमा बरकार रखने की प्रतिबद्धता है या नहीं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के मुताबिक, प्रस्तावित विधेयक में वीटो का एक प्रावधान है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता कुंठित होगी। सरकार को इस मामले में अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए, क्योंकि यह बेहद गंभीर मुद्दा है। यही नहीं, न्यायिक नियुक्तियों में बदलाव करते हुए न्यायपालिका को भी भरोसे में लेना जरूरी है। उच्चतर न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया निष्पक्ष होनी ही चाहिए, पर न्यायपालिका की स्वायत्तता की भी रक्षा होनी चाहिए।