केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक रंजीत सिन्हा के सरकारी आवास से मिली कथित विजिटर डायरी और उसमें दर्ज नामों की सच्चाई की पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इससे एक बार फिर देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कोयला खदानों के आवंटन और 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस बांटने में सारे नियम-कायदों को दरकिनार कर दिया गया था, जिसकी परिणति सर्वोच्च अदालत द्वारा ऐसे सारे आवंटनों को अवैध करार दिए जाने और लाइसेंसों को रद्द किए जाने के रूप में सामने आ चुकी है। मगर देश के प्राकृतिक संसाधनों की इस लूट के लिए जिम्मेदार लोगों की तह तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है।
चूंकि प्राकृतिक संसाधनों की लूट से जुड़े इन दोनों ही अहम मामलों की जांच सीधे सीबीआई के जिम्मे थी, इसलिए उसके निदेशक की भूमिका स्वतः ही महत्वपूर्ण हो जाती है। इस मामले में याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने जिस कथित डायरी को अदालत में 'साक्ष्य' के बतौर पेश किया है, उसके ब्योरे यदि सही हैं, तो यह वाकई हैरान करने वाली बात होगी कि इतने महत्वपूर्ण मामलों में आरोपित लोग आखिर इतनी सहजता से सीबीआई प्रमुख से मिलते कैसे रहे! वरना मामूली चोरी और लूटपाट जैसे मामलों में बगल की पुलिस चौकी में रिपोर्ट दर्ज करवाने में ही आम आदमी के पैर कांपने लगते हैं।
निश्चय ही, रंजीत सिन्हा और उनके परिवार की निजता की रक्षा की जानी चाहिए, जैसा कि खुद उन्होंने इस कथित डायरी के सामने आने के बाद कहा है। मगर ऐसी मुलाकातों को तो सही नहीं ठहराया जा सकता, जिनसे इतने अहम मामलों की जांच प्रभावित होने की आशंका हो। वास्तव में जांच एजेंसी को राजनीतिक हस्तक्षेप और बाहरी दबाव से मुक्त किए बिना निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।
खुद सीबीआई ने स्वीकार किया है कि उसे कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग, केंद्रीय सतर्कता आयोग, गृह मंत्रालय और विधि मंत्रालय के अधीन काम करना पड़ता है, जिससे उसका काम प्रभावित होता है। यूपीए सरकार के दौरान हालत यह हो गई थी कि कोयला घोटाले से संबंधित जांच की प्रगति रिपोर्ट सरकार को दिखाए जाने के कारण सर्वोच्च अदालत ने सीबीआई को फटकार तक लगाई थी और उसे ‘पिंजरे का तोता’ करार दिया था। असली मुद्दा तो इस तोते की आजादी से जुड़ा है।