पिछले एक पखवाड़े या उससे भी अधिक समय से डेंगू का कहर देश के कई हिस्सों में जिस तरह जारी है, वह चिंता और भय से भी अधिक स्वास्थ्य और साफ-सफाई के मोर्चे पर हमारी उदासीनता और डेंगू से निपटने में हमारी इच्छाशक्ति की कमी के बारे में ही बताता है। अब यह ढर्रा बन गया है कि बारिश खत्म होते-होते डेंगू के मच्छर पनपने और डंक मारने लगते हैं। दशकों पहले बिहार और पश्चिम बंगाल में मलेरिया ने जैसा आतंक बरपाया था, डेंगू का कमोबेश वैसा ही आतंक आज गांव-कस्बों से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विकसित इलाकों तक में महसूस किया जा सकता है।
इस बार भी डेंगू उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में फैला हुआ है। पर इसकी जैसी दहशत दिल्ली में है, वैसी संभवतः और कहीं नहीं। इससे दो बातें साफ होती हैं। एक यह कि निरंतर विकास की बात कहने और स्मार्ट सिटी की पहल करने के बावजूद देश की राजधानी में कोई गुणात्मक बदलाव अभी आया नहीं है। दिल्ली में ऐसे कई इलाके हैं, जहां न साफ-सफाई का कोई इंतजाम है, न फॉगिंग की नियमित व्यवस्था, न पेयजल आपूर्ति का तंत्र; नतीजतन लोगों को पानी इकट्ठा करके रखना पड़ता है। दूसरा यह कि खुद को उभरती महाशक्ति बताने के बावजूद स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारी तैयारी और सोच में रत्ती भर फर्क नहीं आया है। इसी का नतीजा है कि डेंगू के मरीजों की भीड़ अस्पतालों में पहुंचते ही अफरातफरी फैल जाती है, एक बेड में एक से अधिक मरीज लिटाए जाते हैं, और कई जगह मरीजों को वापस लौटा दिया जाता है।
बाढ़ और सूखे की तरह, पूर्वांचल में इनसेफेलाइटिस की तरह शहरी भारत में डेंगू का कहर अब हर साल दिखता है, लेकिन इससे निपटने की तैयारी का आलम यह है कि ऐसे हर अवसर पर अस्पतालों, बिस्तरों, दवाओं, और सबसे अधिक हमारी इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती है! स्मार्ट सिटी और स्वच्छ भारत अभियान की सफलता की कसौटी ही यह होगी कि हम डेंगू जैसी बीमारियों को निर्मूल करने के बारे में सोचें। स्वास्थ्य सेवा को इतना मजबूत बनाने की जरूरत है, जिससे कि हर मरीज को इलाज मिले। देश की राजधानी में स्वास्थ्य सेवा सुधरेगी, तभी तो दूर-दराज के इलाकों में तस्वीर बदेलगी।