भारतीय जनता पार्टी अब तक प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए नरेंद्र मोदी के नाम के खुले ऐलान से बचती रही है। मगर, गुजरात विधानसभा चुनावों में तेजी आने के साथ ही पार्टी के भीतर जिस तरह से उनके नाम पर सहमति बन रही है, उससे भाजपा में मची उथल-पुथल का अंदाजा लगाया जा सकता है।
अभी कुछ दिन पहले तक भाजपा अध्यक्ष कहते रहे हैं कि उनकी पार्टी में प्रधानमंत्री पद के आधा दर्जन उम्मीदवार हैं। मगर अब लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे से लेकर बिहार भाजपा के अध्यक्ष सीपी ठाकुर तक मोदी को प्रधानमंत्री पद के योग्य बता रहे हैं और पिछले चुनाव तक 'प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री' का तमगा लटकाए लालकृष्ण आडवाणी को भी अब उनमें विकास का 'रोल मॉडल' दिख रहा है। खुद मोदी ने पार्टी का संकल्प पत्र जारी करते हुए वायदों की जिस तरह से झड़ी लगाई है, उससे इन चुनावों के निहितार्थ को समझने में चूक नहीं करनी चाहिए।
30 लाख युवाओं को रोजगार, पचास लाख मकान, किसानों को कर्ज में रियायत, 10,000 करोड़ की सिंचाई परियोजना और रोजगार का अधिकार ऐसे ही वायदे हैं, जिनमें विकास के अक्स तो दिखते ही हैं, मगर यह मोदी का राजनीतिक रोडमैप भी है। इसके साथ ही पार्टी के भीतर और बाहर मोदी को लेकर चल रही बहस में गुजरात के चुनावों को राष्ट्रीय जनमतसंग्रह में बदलने का कौशल देखा जा सकता है।
ऐसा भी लगता है कि अपने अध्यक्ष नितिन गडकरी को लेकर हुए विवाद, राम जेठमलानी के अप्रिय प्रकरण और बीएस येदियुरप्पा की बगावत से भीतर से कमजोर पड़ती भाजपा मोदी के नेतृत्व में आश्रय तलाश रही है। लगातार तीसरी पारी के लिए मैदान में उतरे मोदी का कद निश्चय ही पार्टी के भीतर बढ़ा है, मगर उनकी विराट राजनीतिक संभावनाओं को दंगों के पुराने जख्म कुरेद सकते हैं।
सवाल सिर्फ भाजपा का नहीं, एनडीए का भी है, जिसमें उनकी स्वीकार्यता बड़ी चुनौती होगी। और क्या संघ उनके नाम पर सहमत होगा? इस सबके बीच यह स्वीकार करना पड़ेगा कि मोदी ने सिर्फ भाजपा ही नहीं, पार्टी के बाहर भी हलचल पैदा कर दी है, जिसकी गूंज गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद तेज हो सकती है।