बीते कुछ समय से उत्तर भारत भीषण ठंड की चपेट में है। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड ने बर्फ की चादर ओढ़ ली है, तो उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में बारिश हो रही है। राहत का सूरज कहीं दिखता है, कहीं लाख मनुहार के बावजूद नहीं निकलता। कोहरे ने वाहनों की ही नहीं, दैनंदिन जीवन की गति भी जैसे रोक दी है। उत्तर प्रदेश में शीतलहर के साथ ही मौतों का सिलसिला शुरू हो गया है।
सांप्रदायिक हिंसा का शिकार बने लोगों के लिए बने राहत शिविर पहले ही बदहाली के कारण चर्चा में थे, अब वहां से ठंड के कारण हो रही मौत की खबर आ रही है। राजधानी दिल्ली में भीषण सर्दी की वजह से एक रात में छह बेघर लोगों की मृत्यु तो स्तब्ध करने वाली है।
साल के पहले ही दिन दो बेघरों की मौत पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने नए और बेहतर रैन बसेरों के निर्माण के लिए अड़तालीस घंटे की समय सीमा तय की थी। अगर उस पर अमल होता, तो ऐसी त्रासदी नहीं होती। दिल्ली चूंकि देश की राजधानी है, इसलिए वहां पर्याप्त रैन बसेरों के अभाव में ठंड के कारण होने वाली मौतें आश्चर्य का विषय है, बाकी जगहों में तो सर्दी का मुकाबला करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्थाएं राम भरोसे ही हैं।
शहरी इलाकों में रैन बसेरे तो हैं, लेकिन उनमें कुछ दूसरी किस्म की अव्यवस्थाएं घर कर गई हैं। दिल्ली की ही बात करें, तो ज्यादातर ऐसे ठिकानों में असामाजिक तत्व शाम ढलते ही कब्जा जमा लेते हैं, ऐसे में रात में काम करने के बाद सोने जाने वालों को वहां जगह ही नहीं मिलती।
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में भीषण सर्दी के समय पहले प्रशासन की ओर से अलाव जलाने की व्यवस्था थी, जो अब कम रह गई है। यह सही है कि ठंड का प्रकोप शहरों-कस्बों में रहने वाले बेघर ही ज्यादा झेलते हैं, लेकिन ऐसे मौसम में गांवों में रहने वाले गरीबों की भी अपनी मुश्किलें हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता। बर्फबारी से सड़कें बंद हो जाएं या असमय की बारिश से फसल खराब हो जाए, तो समझा जा सकता है, लेकिन ठंड से होने वाली मौतें का कोई तर्क गले नहीं उतरता।
इक्कीसवीं सदी में महाशक्ति बनने को बेकरार यह देश कभी बाढ़, कभी सूखा, तो कभी ठंड से होने वाली मौतों को जायज नहीं ठहरा सकता।